उत्तम क्षमा धर्म की पूजा से हुआ पर्व का शुभारंभ, मंदिरों में अभिषेक-शांतिधारा और विधान में उमड़े श्रद्धालु
अलवर। दिगंबर जैन समाज का दस दिवसीय दशलक्षण पर्व बुधवार से श्रद्धा और धार्मिक उल्लास के साथ शुरू हो गया। पर्व के पहले दिन शहर के विभिन्न दिगंबर जैन मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू हो गई। मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा, नित्य नियम पूजन और विधान सहित विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।
स्थानीय स्कीम नंबर 10 स्थित जैन भवन में चातुर्मास के लिए विराजमान दिगंबर जैन संत मुनि सौम्य सागर महाराज और मुनि निश्चल सागर महाराज के सानिध्य में जीवन विकास शिविर की शुरुआत हुई। शिविर के पहले दिन उत्तम क्षमा धर्म की पूजा-अर्चना की गई।
वहीं अलवर-जयपुर रोड स्थित अहिंसा स्थल दिगंबर जैन मंदिर में ध्वजारोहण के साथ दशलक्षण पर्व का शुभारंभ हुआ।
सुबह से मंदिरों में धार्मिक आयोजन
जैन पत्रकार महासंघ अलवर के जिला संयोजक हरीश जैन ने बताया कि दशलक्षण पर्व के पहले दिन सुबह करीब 6:30 बजे से शहर के अधिकांश दिगंबर जैन मंदिरों में धार्मिक आयोजन शुरू हो गए थे।
श्रद्धालुओं ने विधिवत रूप से श्रीजी का अभिषेक, शांतिधारा, नित्य नियम पूजन और विधान में भाग लिया। स्कीम नंबर 10, बलजी राठौड़ की गली, मन्नी का बड़, मुंशी बाजार, जैन नसिया जी और अहिंसा स्थल दिगंबर जैन मंदिर सहित विभिन्न मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।
सुबह के समय मंदिरों में धार्मिक वातावरण बना रहा और श्रद्धालुओं ने भगवान जिनेंद्र की पूजा-अर्चना कर दशलक्षण पर्व के प्रथम धर्म का पालन करने का संकल्प लिया।
क्रोध का त्याग ही उत्तम क्षमा धर्म
जैन भवन में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम के दौरान वर्षायोग पर ससंघ विराजमान दिगंबर जैन संत मुनि सौम्य सागर महाराज ने उत्तम क्षमा धर्म की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि दशलक्षण पर्व का पहला दिन उत्तम क्षमा धर्म को समर्पित होता है।
मुनि श्री के अनुसार, जब क्रोध करने का कारण सामने मौजूद हो और व्यक्ति फिर भी क्रोध न करे, वही क्षमा का भाव है। उन्होंने कहा कि क्रोध की स्थिति में उसे नियंत्रित रखना भी क्षमा की भावना को दर्शाता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को जीवन में क्षमा और संयम के भाव को अपनाने का संदेश दिया।
क्रोध से दूसरों से ज्यादा स्वयं का नुकसान
अहिंसा स्थल दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान बालाचार्य दिगंबर जैन मुनि अभिनंदन सागर महाराज ने भी उत्तम क्षमा धर्म का महत्व बताया।
उन्होंने कहा कि क्रोध व्यक्ति के अपने जीवन को प्रभावित करता है। जिस व्यक्ति पर क्रोध किया जा रहा है, जरूरी नहीं कि उसका उतना नुकसान हो, जितना क्रोध करने वाले व्यक्ति के जीवन और मन की शांति पर असर पड़ता है।
मुनि श्री ने कहा कि क्रोध का त्याग करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव आता है और व्यक्ति को आत्मिक शांति की अनुभूति होती है।
दशलक्षण पर्व के आगामी दिनों में जैन मंदिरों में दस धर्मों से संबंधित धार्मिक कार्यक्रम, पूजा-अर्चना और प्रवचन आयोजित किए जाएंगे।
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