More
    HomeFeaturedकैलाश नवरंग, फोटोग्राफी के 50 साल : कभी घना के अजगर से...

    कैलाश नवरंग, फोटोग्राफी के 50 साल : कभी घना के अजगर से कभी लद्दाख के ऊंट से हुआ मुकाबला

    अजगर, बाघ और हाथी से लेकर पहाड़ की गहरी खाई तक,वन्यजीव फोटोग्राफी में कई बार सामने आईं चुनौतियां, लेकिन तस्वीरों की तलाश में कदम कभी नहीं रुके

    राजेश रवि राजेश रवि, मिशन सच न्यूज

    अगर आपकी भी कहानी इस तरह की है  जिसे मिशन सच की वेबसाइट या हमारे प्रिंट अखबार  में स्थान मिलना चाहिए तो मैसेज करे – 9649856000

    भरतपुर में सुबह के चार बज रहे हैं। शहर की ज्यादातर आबादी अभी गहरी नींद में है, लेकिन भरतपुर के 69 वर्षीय कैलाश नवरंग के दिन की शुरुआत हो चुकी है। हाथ में कैमरा है और सामने प्रकृति का पूरा संसार। पक्षियों की चहचहाहट, जंगल की खामोशी, पेड़ों पर पड़ती सुबह की पहली किरण और वन्यजीवों की हलचल । यह सब उनके लिए किसी किताब के पन्नों से कम नहीं। वे इन पलों को सिर्फ देखते नहीं, कैमरे में कैद कर आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेज भी लेते हैं। आज का दिन कुछ खास इसलिए है कि वर्ष 1957 में 18 सितंबर को ही उनका जन्म हुआ था। 

    इस उम्र में जंगल की हलचल को कैमरे में कैद करने वाले इस शख्स के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि    नवरंग की पढ़ाई भी इसी शहर में हुई। कक्षा आठ में पढ़ते समय ही उन्हें फोटोग्राफी से गहरा लगाव हो गया, और धीरे-धीरे यह शौक जुनून में बदल गया। वर्ष 1987 से उन्होंने इसे पूरी गंभीरता के साथ अपना लिया। कक्षा आठ के उस दिन से आज तक, करीब पांच दशक लंबे इस सफर में उन्होंने वन्यजीव, पक्षी, प्रकृति, संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहरों को अपने कैमरे में उतारा हैजिम कॉर्बेट, रणथंभौर, काजीरंगा, चितवन और ताडोबा नेशनल पार्क से लेकर भरतपुर के अपने केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान तक।

    हर तस्वीर के पीछे एक कहानी

    बोलती तस्वीर
    बोलती तस्वीर

    नवरंग की तस्वीरों की खासियत सिर्फ उनका दृश्य सौंदर्य नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी कहानियां भी हैं। वन्यजीव फोटोग्राफी में सही तस्वीर के लिए अक्सर घंटों इंतजार करना पड़ता है। कभी धैर्य की परीक्षा होती है तो कभी जान जोखिम में पड़ जाती है। केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान यानी भरतपुर बर्ड सेंचुरी में फोटोग्राफी के दौरान एक बार अचानक उनके ऊपर अजगर आ गिरा था। वह इतने करीब था कि उसकी पकड़ में आने का खतरा पैदा हो गया था, लेकिन सौभाग्य से वे बाल-बाल बच गए। यह अनुभव उन्हें आज भी उतना ही जीवंत याद है। उत्तराखंड की फूलों की घाटी में फोटोग्राफी करते समय उनका पैर पहाड़ पर फिसल गया और वे एक गहरे गड्ढे में जा गिरे थे; आसपास मौजूद लोगों ने उन्हें बाहर निकाला। चितवन नेशनल पार्क में एक बाघ की तस्वीर लेते समय बाघ उनकी जिप्सी के पीछे दौड़ पड़ा, तो जिम कॉर्बेट में एक हाथी ने उन पर हमला करने की कोशिश की। लद्दाख में ऊंटों की फोटोग्राफी के दौरान एक ऊंट महज एक फुट की दूरी से उनके ऊपर से गुजर गया। हर बार खतरा टल गया, लेकिन कैमरे के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ।

    कैमरा उनका जीवन है

    कैलाश नवरंग
    कैलाश नवरंग

    69 साल की उम्र में भी कैलाश नवरंग की दिनचर्या किसी युवा फोटोग्राफर से कम नहीं। वे रोज सुबह करीब चार बजे उठते हैं और नौ बजे तक फोटोग्राफी करते हैं, फिर शाम को चार से छह बजे तक दोबारा कैमरा लेकर प्रकृति के बीच निकल जाते हैं। उनके लिए फोटोग्राफी सिर्फ तस्वीर लेने की कला नहीं, प्रकृति को समझने का माध्यम है। पक्षियों का व्यवहार पढ़ना, उनके ठिकानों को समझना और सही क्षण को कैमरे में कैद करना। यह सब निरंतर अभ्यास और धैर्य से ही आता है। वे कहते हैं कि आज भी वे अपनी फोटोग्राफी से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं; कैमरा हाथ में लेते ही लगता है कि अभी कुछ नया, कुछ अनदेखा सामने लाना बाकी है। यही जिज्ञासा उन्हें लगातार सीखने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

    तस्वीरों से जागरूकता का प्रयास

    गजब की फोटो
    गजब की फोटो

    कैलाश नवरंग ने फोटोग्राफी को कभी अपने तक सीमित नहीं रखा। जयपुर, उदयपुर, माउंट आबू, चित्तौड़गढ़, मुंबई, दिल्ली और भरतपुर सहित कई शहरों में उनकी फोटो प्रदर्शनियां लग चुकी हैं, जिनके जरिए उन्होंने लोगों को पक्षियों और प्रकृति के प्रति जागरूक करने की कोशिश की। कई स्कूलों में भी प्रदर्शनियों के जरिए विद्यार्थियों को वन्यजीवों की दुनिया से परिचित कराया। उनकी तस्वीरें समाचार पत्रों और वाइल्डलाइफ पत्रिकाओं में भी लगातार प्रकाशित होती रही हैं; उन्होंने दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका जैसे प्रमुख अखबारों के लिए भी फोटोग्राफी की है। इस दौरान उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सम्मान मिले। वर्ष 1995 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने उन्हें सम्मानित किया था, तो कई संस्थाओं और जिला प्रशासन की ओर से 15 अगस्त व 26 जनवरी के मौकों पर भी उन्हें सम्मान मिल चुका है।

    अब तक 35 से अधिक प्रदर्शनियां लगाई 

    वे अब तक 35 से अधिक फोटोग्राफी प्रदर्शनियां लगा चुके हैं। उनकी प्रदर्शनियां स्कूल, कॉलेज, सूचना केंद्र, स्टेडियम सहित विभिन्न स्थानों पर आयोजित हुई हैं। प्रकृति और वन्यजीवन की फोटोग्राफी के लिए उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है। उनका फोटोग्राफी सफर आज भी जारी है। 

    कैमरा अब अगली पीढ़ी के हाथ में

    कैलाश नवरंग की यह यात्रा अब परिवार की अगली पीढ़ी तक भी पहुंच चुकी है। उनकी पत्नी शीला देवी गृहिणी हैं और उनकी तीनों बेटियों का विवाह हो चुका है। दोनों बेटे दीपक और खुशवंत भी फोटोग्राफी के व्यवसाय से जुड़े हैं और भरतपुर में ‘नवरंग फोटो स्टूडियो’ के नाम से अपना काम संभाल रहे हैं। करीब पांच दशक पहले कक्षा आठ के एक विद्यार्थी ने जो कैमरा हाथ में उठाया था, वह आज भी कैलाश नवरंग के हाथों में उतना ही सक्रिय है। जंगल, पक्षी, पहाड़, फूल और वन्यजीव आज भी उन्हें उतना ही आकर्षित करते हैं, जितना पहली बार कैमरा उठाते समय करते थे। उनकी कहानी बताती है कि फोटोग्राफी सिर्फ कैमरे और तस्वीर का रिश्ता नहीं, बल्कि जिज्ञासा, धैर्य, जोखिम और प्रकृति से जुड़ाव का एक लंबा सफर है, जिसमें वे आज भी उसी उत्साह से आगे बढ़ रहे हैं । उम्र भले बढ़ी हो, कैमरे की नजर अब भी किसी नई तस्वीर की तलाश में है।

    मिशनसच न्यूज के लेटेस्ट अपडेट पाने के लिए हमारे व्हाट्सप्प ग्रुप को जॉइन करें।
    https://chat.whatsapp.com/JX13MOGfl1tJUvBmQFDvB1

    अन्य खबरों के लिए देखें मिशनसच नेटवर्क

    https://missionsach.com/category/india

     

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here