काठमांडू। नेपाल की भोटे कोशी और त्रिशूली नदियों में आई विनाशकारी आपदा ने संपूर्ण विश्व का ध्यान हिमालयी क्षेत्र में तेजी से घटित हो रहे पर्यावरणीय बदलावों की ओर आकर्षित किया है। लांगटांग लिरुंग चोटी से अचानक स्खलित हुए 110 मिलियन क्यूबिक मीटर चट्टान और बर्फ के विशाल मलबे ने निचले क्षेत्रों में भयंकर तबाही मचाई। इस हृदयविदारक त्रासदी में 1,300 से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी, जबकि हजारों अन्य लोग लापता हो गए।
दशकों से बनते जटिल हालातों और जलवायु परिवर्तन का परिणाम
आमतौर पर किसी प्राकृतिक आपदा के पीछे कोई एक तात्कालिक कारण दिखाई देता है, किंतु इस तबाही की पृष्ठभूमि अत्यंत गहरी है। 'वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन' (WWA) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि यह त्रासदी केवल एक घटना का नतीजा नहीं, बल्कि दशकों से बन रही जटिल परिस्थितियों, कमजोर भूवैज्ञानिक संरचना और मानव-जनित जलवायु परिवर्तन की एक भयंकर श्रृंखला का प्रतिफल थी।
ग्लेशियर का सिकुड़ना और पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना बना मुख्य कारण
वैश्विक तापमान में निरंतर वृद्धि के कारण लांगटांग-लिरुंग ग्लेशियर का दायरा लगातार घट रहा था। वर्ष 1815 में जो ग्लेशियर 18.9 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ था, वह सिकुड़कर बेहद कम रह गया। ग्लेशियर के पीछे हटने से सदियों से सहारा पा रही चट्टानी दीवारें बेसहारा हो गईं। इसके अतिरिक्त, ऊंचे पर्वतों की दरारों में जमी बर्फ (पर्माफ्रॉस्ट), जो प्राकृतिक गोंद की भांति चट्टानों को जोड़कर रखती थी, तापमान बढ़ने से पिघलने लगी। इससे ढलानों की स्थिरता बेहद कमजोर हो गई।
भूकंपीय झटकों का असर और मौसम के बदलते मिजाज की भूमिका
वर्ष 2015 में आए 7.8 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप ने इस पर्वतीय ढलान को आंतरिक रूप से गंभीर नुकसान पहुंचाया था, जिससे यह स्खलन की कगार पर पहुंच गई थी। इसके साथ ही क्षेत्र में वर्षा और हिमपात के पैटर्न में बड़ा बदलाव देखा गया है। जिन क्षेत्रों में पूर्व में बर्फबारी होती थी, वहां अब बारिश होने लगी है, जिससे पानी दरारों में प्रवेश कर चट्टानों को अलग कर रहा है।
मात्र आठ मिनट में 20 किलोमीटर तक फैली प्रलयकारी तबाही
उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, लगभग 5,150 मीटर की ऊंचाई से चट्टान और ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा टूटकर 1,400 मीटर नीचे आ गिरा। इस स्खलन से उत्पन्न ऊर्जा 5.2 तीव्रता के भूकंप के समान थी। नीचे गिरते समय अत्यधिक घर्षण से बर्फ पिघली और मलबे ने ल्हेंडे खोला नदी में पहुंचकर विकराल रूप धारण कर लिया। मात्र 7 से 8 मिनट के भीतर इस तेज बहाव ने 20 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए जलविद्युत परियोजनाओं, आवासीय बस्तियों और कृषि भूमि को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।
पारंपरिक पूर्व चेतावनी प्रणालियों की सीमाएं उजागर
अध्ययन में इस तथ्य को रेखांकित किया गया है कि यह आपदा पारंपरिक नदी जल-पूर्वानुमान प्रणालियों की क्षमता से परे थी। जिस प्रचंड गति और पैमाने पर यह तबाही आई, उसमें यदि कोई अत्याधुनिक चेतावनी प्रणाली ढलान खिसकने का पूर्वाभास कर भी लेती, तो भी स्थानीय निवासियों के पास सुरक्षित स्थानों पर जाने के लिए केवल कुछ ही मिनटों का समय होता, जो बड़े पैमाने पर लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए पर्याप्त नहीं था।


