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    वार्डों में कांटे की टक्कर, लेकिन मेयर-सभापति की कुर्सियों पर BJP की बढ़त; निर्दलीय बने गेमचेंजर

    जयपुर। राजस्थान के हालिया निकाय चुनाव के नतीजों ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। वार्ड स्तर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के बीच मुकाबला बेहद कड़ा और कांटे का रहा, लेकिन अध्यक्ष, सभापति और मेयर की कुर्सियों के चुनाव आते-आते तस्वीर पूरी तरह बदल गई। इस चुनाव में भले ही जनता ने वार्डों में दोनों दलों को लगभग बराबरी पर रखा, लेकिन सत्ता की चाबी अंततः जोड़-तोड़, निर्दलीयों और बागियों के पाले में दिखाई दी।

    वोट शेयर और वार्डों का कड़ा मुकाबला

    राज्य के 10,244 वार्डों के आए चुनाव परिणामों में भाजपा ने 4,182 और कांग्रेस ने 3,619 वार्डों पर जीत दर्ज की, जबकि 2,273 वार्डों पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहे। यदि कुल वोट शेयर पर नजर डालें तो भाजपा को 35.18 फीसदी और कांग्रेस को 34.24 फीसदी वोट मिले। दोनों प्रमुख दलों के बीच वोटों का यह अंतर 1 प्रतिशत से भी कम (महज 0.94%) था। इसके बावजूद, जब 301 निकायों में अध्यक्ष, सभापति और मेयर के परिणाम घोषित हुए, तो भाजपा ने 197 पदों पर कब्जा जमाया, जबकि कांग्रेस के खाते में केवल 94 पद आए और निर्दलीय मात्र 7 स्थानों पर ही सिमट कर रह गए।

    निर्दलीयों का दबदबा और सत्ता का गणित

    इस चुनाव में निर्दलीय पार्षदों ने अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई और कई जगहों पर वे किंगमेकर की भूमिका में नजर आए। भरतपुर में निर्दलीयों ने 36 वार्ड जीतकर अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया, जहां भाजपा के पास 20 और कांग्रेस के पास केवल 7 पार्षद थे। इसके बावजूद, राजनीतिक समीकरणों के तहत भाजपा की अनुराधा सिंह निर्विरोध मेयर चुन ली गईं। इसी तरह हनुमानगढ़ (34 वार्ड) और सादुलशहर (22 वार्ड) में निर्दलीयों ने अपनी ताकत दिखाई और मंजू व मनीषा को सभापति की कुर्सी दिलाई। हालांकि, कुल 301 निकायों में से निर्दलीय केवल 7 स्थानों पर ही अध्यक्ष या सभापति की कुर्सी हासिल कर सके।

    क्रॉस-वोटिंग और सियासी जोड़-तोड़

    अजमेर, अलवर, लक्ष्मणगढ़ और जोधपुर जैसे कई शहरों में राजनीतिक दलों ने अपने दम पर बहुमत न होने के बावजूद निर्दलीयों और बागियों को साधकर बोर्ड पर कब्जा जमाया।

    • अजमेर: कांग्रेस 37 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन भाजपा की अनामिका शर्मा ने अन्य पार्षदों का समर्थन हासिल कर 43 वोट पाकर मेयर की कुर्सी जीत ली।

    • पाली: कांग्रेस ने 29 वार्ड जीते थे, लेकिन क्रॉस-वोटिंग और अंदरूनी कलह के चलते भाजपा की नमिता बुबकिया 33 वोट पाकर मेयर बनने में सफल रहीं।

    • लक्ष्मणगढ़: भाजपा के पास सिर्फ 6 पार्षद थे, लेकिन 13 निर्दलीयों के समर्थन से भाजपा की मीना गुप्ता चेयरमैन बन गईं।

    कांग्रेस के लिए संगठन संबंधी चुनौतियां

    यह चुनाव परिणाम कांग्रेस पार्टी के लिए एक बड़ा सबक साबित हुए हैं। कई निकायों में पार्टी ने भाजपा से ज्यादा वार्ड जीते, लेकिन इसके बावजूद वह अपने पार्षदों को एकजुट रखने और अध्यक्ष या मेयर की कुर्सी बचाने में असफल रही। अजमेर और पाली जैसे जिलों में पार्टी के भीतर हुई क्रॉस-वोटिंग और अनुशासनहीनता ने संगठन की कमजोरी को उजागर किया है। दूसरी ओर, भाजपा ने रणनीतिक रूप से बेहतर प्रदर्शन करते हुए अपने से बाहर के पार्षदों और बागियों को साथ जोड़ा और सत्ता हासिल करने में बाजी मार ली। गुप्त मतदान प्रणाली ने भी इस पूरी चुनावी प्रक्रिया में क्रॉस-वोटिंग और समर्थन के खेल को और अधिक रोचक बना दिया।

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