जैन धर्मशाला में श्रद्धा के साथ संपन्न हुआ केशलोच आयोजन, चांदी के कलश के लिए समाजजनों ने लगाई बोली
जैन मुनि आचार्य ज्ञानभूषण जी का इंटरव्यू के लिए इस लिंक पर क्लिक करे- https://youtu.be/oJAtm_fgH5U?si=AULRE9fos8Nf5i3h
नौगांवा। सकल दिगंबर जैन समाज नौगांवा की ओर से आचार्य श्री 108 ज्ञानभूषण मुनिराज का केशलोच समारोह श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ आयोजित किया गया। बस स्टैंड स्थित जैन धर्मशाला के प्रांगण में हुए इस धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु शामिल हुए। समारोह के दौरान मुनिराज के केशलोच के साथ त्याग, तप, संयम और वैराग्य के महत्व को रेखांकित किया गया।
श्रद्धालुओं की मौजूदगी में हुआ केशलोच
समारोह के दौरान आचार्य श्री 108 ज्ञानभूषण मुनिराज का केशलोच धार्मिक विधि के अनुसार संपन्न हुआ। उपस्थित श्रद्धालुओं ने इस प्रक्रिया को श्रद्धाभाव से देखा। केशलोच से प्राप्त केशों को चांदी के कलश में एकत्रित किया गया।
इसके बाद जैन समाज के प्रबुद्धजनों द्वारा बोली लगाकर कलश छुड़वाया गया। कलश प्राप्त करने को लेकर समाजजनों में विशेष उत्साह दिखाई दिया। आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं ने मुनिराज के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की।
बच्चियों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने दिया धर्म-संस्कृति का संदेश
कार्यक्रम में जैन समाज की बच्चियों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। प्रस्तुतियों के माध्यम से भगवान महावीर के अहिंसा, संयम और त्याग के संदेश को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया। साथ ही धार्मिक संस्कारों और भारतीय संस्कृति के महत्व को भी दर्शाया गया।
कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ. कवि कमलेश बसंत ने किया। समारोह में समाज के पदाधिकारी, प्रबुद्धजन, महिलाएं, बच्चे और बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
मुनिराज के दर्शन और प्रवचन का लिया लाभ
समारोह के अंत में समाजजनों ने आचार्य श्री 108 ज्ञानभूषण मुनिराज के दर्शन किए और उनके प्रवचनों का लाभ लिया। श्रद्धालुओं ने धर्म के मार्ग पर चलने तथा जीवन में अहिंसा, संयम और त्याग के सिद्धांतों को अपनाने का संकल्प लिया।
क्या होता है केशलोच?
केशलोच जैन मुनियों की साधना और त्याग से जुड़ी एक महत्वपूर्ण धार्मिक प्रक्रिया है। इसमें मुनिराज सिर के बालों को कैंची या उस्तरे से काटने के बजाय अपने हाथों से उखाड़कर त्याग करते हैं। जैन परंपरा में इसे शरीर के प्रति आसक्ति कम करने, सहनशीलता और आत्मसंयम की साधना का प्रतीक माना जाता है।
जैन दर्शन में केशलोच का संबंध त्याग, तप, संयम और वैराग्य से है। इसका उद्देश्य साधु जीवन में बाहरी सुख-सुविधाओं और शरीर के प्रति मोह से दूर रहकर आत्मकल्याण की साधना करना है। इस प्रक्रिया के दौरान मुनिराज धैर्य और समता का भाव बनाए रखने का अभ्यास करते हैं।
इसी कारण जैन समाज में केशलोच को केवल एक धार्मिक प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि त्यागपूर्ण साधु जीवन और आध्यात्मिक अनुशासन की प्रेरक परंपरा के रूप में देखा जाता है।
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