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    इस बार दुर्गापूजा पंडालों में दिखेगा भारत का रंग, रामराज से पद्म तक खास थीम

    कोलकाता: पश्चिम बंगाल की विश्व प्रसिद्ध दुर्गापूजा में इस बार पारंपरिक उल्लास के साथ-साथ बदले हुए राजनीतिक और सामाजिक माहौल की अनोखी झलक देखने को मिल रही है। इस बार के शरदोत्सव में विभिन्न पूजा समितियों ने अपनी थीम के जरिए समाज, संस्कृति और आस्था से जुड़े गहरे संदेश दिए हैं।

    कुशासन से सुशासन और रामराज की थीम

    मध्य कोलकाता की तारा चंद दत्ता स्ट्रीट पर स्थित 'यंग बॉयज क्लब' अपनी 57वीं दुर्गापूजा मना रहा है, जिसने इस बार 'राम राज' को अपनी मुख्य थीम बनाया है। पंडाल में भगवान राम और हनुमान की भव्य प्रतिमाओं के साथ-साथ शांति, गरिमा, न्याय और सद्भाव से जुड़े संदेश देते चित्र व पोस्टर लगाए गए हैं। आयोजकों का कहना है कि इस थीम को हाल ही में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद राज्य में कुशासन से सुशासन की ओर बढ़ते बदलाव के संदेश से जोड़ा गया है। इसके अलावा, पूर्व मेदिनीपुर के कारीगरों द्वारा सूखे पत्तों और फूलों से पंडाल तैयार किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य कला के साथ-साथ न्याय, करुणा और जिम्मेदारी का संदेश देना है।

    इस बार पंडालों के प्रमुख आकर्षण

    • यंग बॉयज क्लब: 'राम राज' (कुशासन से सुशासन का संदेश)

    • कुम्हारटोली पार्क: 'गंगोत्री से गंगा' (हिमालय से निकलकर सागर तक नदी की यात्रा और भारतीय आस्था का संगम)

    • सुरुचि संघ (न्यू अलीपुर): 'पद्म' (कमल के फूल के जरिए भारतीय कला, संस्कृति और आध्यात्मिकता की प्रस्तुति, जो इस क्लब की 74वीं पूजा है)

    • कुम्हारटोली: पारंपरिक 'शाबेकी' प्रतिमाओं पर विशेष जोर

    गंगोत्री से गंगा और पद्म तक का सफर

    कोलकाता के प्रसिद्ध 'कुम्हारटोली पार्क' ने इस वर्ष 'गंगोत्री से गंगा' को अपनी थीम चुना है। इसके माध्यम से गंगोत्री से निकलकर समुद्र तक पहुंचने वाली गंगा की पवित्र यात्रा को कलात्मक रूप से दर्शाया गया है, जो भारतीय जीवन और संस्कृति का अहम हिस्सा है। वहीं, दक्षिण कोलकाता के 'सुरुचि संघ' ने अपनी 74वीं वर्षगांठ पर 'पद्म' (कमल) को केंद्र में रखकर भारतीय संस्कृति और अध्यात्म को बेहद खूबसूरती से उकेरा है।

    प्रतिमाओं में पारंपरिक 'शाबेकी' रूप बरकरार

    पंडालों में भले ही आधुनिक और वैचारिक थीम पर प्रयोग किए जा रहे हों, लेकिन मूर्तियों के मामले में पारंपरिक 'शाबेकी' रूप पर ही सबसे ज्यादा जोर दिया जा रहा है। कुम्हारटोली के प्रसिद्ध मूर्तिकार बाबू पाल का कहना है कि इस बार भी भारतीय संस्कृति और पारंपरिक कलाओं को ही प्राथमिकता दी जा रही है, हालांकि बारिश और बढ़ती लागत जैसी समस्याओं ने कारीगरों के लिए थोड़ी चुनौती जरूर खड़ी की है।

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