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    बेटियों को विदा नहीं किया जाता, दामाद ही छोड़ते हैं अपना घर; MP के गांव की अनोखी परंपरा

    विदिशा: आज के इस आधुनिक और वैज्ञानिक युग में भी भारतीय समाज में प्राचीन परंपराओं और रीति-रिवाजों का अनूठा पालन किया जाता है। आपने आमतौर पर यह देखा होगा कि चाहे गांव हो या शहर, सदियों पुरानी इस रीति के अनुसार बेटियों की शादी होने के बाद वे अपने ससुराल चली जाती हैं और वहीं रहकर परिवार की देखभाल करती हैं। लेकिन मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के एक छोटे से गांव में इस पारंपरिक नियम का ठीक उल्टा पालन किया जाता है। जी हाँ, इस गांव में शादी के बाद दामाद अपनी ससुराल आते हैं और वहीं रहकर अपने ससुराल की पूरी कमान संभालते हैं। हैरानी की बात यह है कि यह अनोखी परंपरा आज से नहीं, बल्कि पिछले कई दशकों और पीढ़ियों से चली आ रही है।

    80 प्रतिशत घरों में दामाद निभाते हैं ससुराल की पूरी जिम्मेदारी

    मध्य प्रदेश का हर जिला और हर गांव अपनी किसी न किसी खास और अनूठी पहचान के लिए जाना जाता है। उन्हीं में से एक प्रमुख नाम विदिशा जिले के भटौली गांव का है, जो सिरोंज जनपद मुख्यालय से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ है। यह छोटा सा गांव अब पूरे प्रदेश और देश भर में अपनी इस हैरान करने वाली और अनोखी परंपरा के कारण एक विशिष्ट पहचान बना चुका है।

    प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस गांव में कुल 100 परिवार निवास करते हैं और यहाँ की कुल आबादी लगभग 650 लोगों की है। भटौली गांव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ शादी के बाद लगभग 80 प्रतिशत घरों के दामाद अपनी ससुराल में ही स्थायी रूप से बस जाते हैं और वहीं की पूरी देखरेख के साथ-साथ घर-परिवार का सारा खर्च भी खुद उठाते हैं। सबसे खास बात यह है कि बिना किसी सामाजिक दबाव या मजबूरी के, हर वर्ग के लोग पूरी श्रद्धा के साथ इस परंपरा का निर्वहन करते आ रहे हैं।

    तीन पीढ़ियों से लगातार चली आ रही है यह अनोखी परंपरा

    भटौली गांव में दामादों के घर-जमाई बनकर बसने की यह परंपरा कोई नई बात नहीं है। यह सिलसिला लगभग तीन पीढ़ियों से अनवरत चला आ रहा है। इस अनोखी प्रथा की शुरुआत 'बुद्धा चौकीदार' नाम के व्यक्ति से हुई थी। उनकी पुत्री सुमित्रा बाई के साथ विवाह के बाद गडरू नामक व्यक्ति इसी गांव में आकर बस गया था। इसके पश्चात गडरू की बेटी केराबाई से हीरालाल ने विवाह किया और वे भी यहीं पर रहने लगे। इस तरह एक ही परिवार के भीतर लगातार तीन पीढ़ियों से दामाद ही घर संभालते आ रहे हैं। इसके अलावा इस गांव में कई घर ऐसे भी देखने को मिल जाते हैं, जहाँ एक ही छत के नीचे दो-दो दामाद एक साथ घर-जमाई के रूप में रह रहे हैं।

    जात-पात और वर्ग के बंधनों से पूरी तरह ऊपर है यह परंपरा

    भटौली गांव की यह अनूठी प्रथा किसी एक विशेष जाति या वर्ग तक सीमित नहीं है। यहाँ पंडित, रघुवंशी, कुशवाह और आदिवासी समाज समेत विभिन्न समुदायों के लोग रहते हैं और सभी समाजों में दामाद अपनी ससुराल में ही निवास करते हैं। इस परंपरा की अनूठी मिसाल यह भी है कि इस गांव के मुख्य मंदिर की पूजा-पाठ और व्यवस्था की जिम्मेदारी भी एक दामाद ही संभाल रहे हैं।

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