More
    Homeमिशन सच स्पेशलनौगावां का पहला पंचायत चुनाव: हाथ उठाओ और सरपंच चुनो, तीन महीने...

    नौगावां का पहला पंचायत चुनाव: हाथ उठाओ और सरपंच चुनो, तीन महीने में ही बगावत, फिर खूनी खेल से रंग गया लोकतंत्र

    नौगावां :  अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के लिए आज की तरह मीटिंग नहीं होती थी

    जिनेश जैन, मिशन सच , जयपुर । वर्ष 1953 में राजस्थान में पंचायती राज का नया-नया कानून बना था। नौगावां का मैदान चुनावी जंग का अखाड़ा बनने जा रहा था। वोटिंग के लिए न कोई पर्ची, न कोई पेटी। सीधा-सादा नियम था— हाथ उठाओ और सरपंच चुनो । पहले पंचायत चुनाव के लिए ​नौगावां के सरकारी स्कूल में 17 गांवों के लोग उमड़ पड़े। एक तरफ थे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े शांतिप्रसाद जैन तो दूसरी तरफ कांग्रेस के सरदार प्रताप सिंह। वे इलाके के दबंग विधायक दुर्लभ सिंह के सगे ससुर भी थे। स्कूल परिसर में कुएं के दोनों तरफ पक्ष और विपक्ष में लोग बैठ गए। भीड़ ने कम्युनिस्ट शांतिप्रसाद के पक्ष में अधिक हाथ उठाए। बहुमत का पलड़ा भारी देखकर शांतिप्रसाद को नौगावां का पहला सरपंच घोषित कर दिया गया।

    ​लेकिन राजनीति का खेल अभी बाकी था…
    ​कुर्सी संभाले अभी तीन-चार महीने ही बीते थे कि शांतिप्रसाद एक शादी में शामिल होने बाहर गए थे। विरोधियों को इसी मौके की तलाश थी! उपसरपंच कर्मसिंह तुरंत अलवर कलेक्टर के दफ्तर पहुंचे और अविश्वास प्रस्ताव की अर्जी टिका दी। कलेक्टर ने भी देर नहीं लगाई—न कोई बैठक हुई, न चर्चा। तब अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के लिए आज की तरह मीटिंग नहीं होती थी। कलेक्टर ने अपने पावर का इस्तेमाल करते हुए शांतिप्रसाद की सरपंची वहीं खत्म कर दी।

    ​रियासती अस्तबल में बगावत की चिंगारी
    ​अब नौगावां में उपचुनाव की घोषणा हुई। नए सरपंच के चुनाव के लिए चुना गया रिसाला। वही जगह, जो स्टेट टाइम में घोड़ों का अस्तबल हुआ करती थी। इस बार मुकाबला कम्युनिस्ट प्रत्याशी नन्नूमल जैन और कांग्रेस के रत्तीराम के बीच था।
    ​17 गांवों के लोगों के लिए वहां बड़ा बाड़ा बनाया गया। एक-एक गांव को बारी-बारी से अंदर बुलाया जाना था। लेकिन चुनावी हवा में बारूद घुला हुआ था। जैसे ही दो गांवों की बारी आई, एसडीएम (निर्वाचन अधिकारी) ने एक गांव के लोगों को अंदर घुसने से रोक दिया।
    ​बस फिर क्या था, गुस्साए ग्रामीणों ने अलवर से आए कम्युनिस्ट विधायक रामानंद अग्रवाल और हारूमल तोलानी से शिकायत की। देखते ही देखते बात इतनी बिगड़ी कि भीड़ ने पुलिस और पोलिंग पार्टी को चारों तरफ से घेर लिया। पत्थर बरसाए गए। एसडीएम और पुलिसकर्मियों की जमकर धुनाई हो गई। इसी हंगामे के बीच किसी ने कच्चे मकान में आग लगा दी। चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई। चुनाव तुरंत स्थगित करना पड़ा।

    गांव में मच गया ​कोहराम
    ​इस बवाल के बाद नौगावां छावनी बन गया। एसडीएम की रिपोर्ट पर नन्नूमल के 11 समर्थकों पर केस दर्ज हुआ। जवाब में नन्नूमल गुट ने भी कांग्रेस के 51 लोगों के खिलाफ एफआईआर ठोक दी। हफ्ते भर तक गांव में खौफ का माहौल रहा। पुलिस गश्त करती रहीं। गिरफ्तारी के डर से नन्नूमल के समर्थक भूमिगत हो गए।
    ​लेकिन लोकतंत्र की यह जंग यहीं खत्म नहीं होनी थी। उपचुनाव की नई तारीख तय हुई। इस बार जगह बदलकर वापस नौगावां का स्कूल रखी गई। भारी पुलिस बल के कड़े पहरे में दोबारा चुनाव हुआ। जब भीड़ से फिर हाथ उठे। जनसमर्थन की बाजी नन्नूमल जैन ने मारी। वे नौगावां के नए सरपंच चुन लिए गए।

    ​इतिहास का नया अध्याय
    ​आजादी के बाद राजस्थान शुरुआत से ही पंचायती राज व्यवस्था में देश का अगुआ रहा। इसी की परिणति थी कि आगे चलकर 2 अक्टूबर 1959 को प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने नागौर से देश में ऐतिहासिक त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का औपचारिक आगाज किया। राजस्थान ने अपने कानूनों में संशोधन कर पूरे देश के सामने लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने की एक अनूठी मिसाल पेश की।

    मिशनसच न्यूज के लेटेस्ट अपडेट पाने के लिए हमारे व्हाट्सप्प ग्रुप को जॉइन करें।
    https://chat.whatsapp.com/JX13MOGfl1tJUvBmQFDvB1

    अन्य खबरों के लिए देखें मिशनसच नेटवर्क

    https://missionsach.com/category/india

     

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here