भुखमरी से बेहाल पाकिस्तान, खाद्य संकट पर क्या है भारत की तैयारी?
“गरीबी, महंगाई, जलवायु आपदाओं और घटती मानवीय सहायता ने पाकिस्तान के खाद्य संकट को गहरा किया है। लेकिन सवाल केवल पड़ोसी देश की बदहाली का नहीं, बल्कि यह भी है कि भारत अपनी खाद्य सुरक्षा को भविष्य के संकटों से बचाने के लिए कितनी तैयारी कर रहा है।”

– के. पी. मलिक, वरिष्ठ पत्रकार
पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली अब केवल कर्ज, महंगाई और विदेशी मुद्रा संकट तक सीमित नहीं रह गई है। संकट की सबसे भयावह तस्वीर उस समय सामने आती है, जब परिवारों के सामने यह सवाल खड़ा हो कि वे बच्चों को भरपेट भोजन कराएं या घर का दूसरा जरूरी खर्च पूरा करें। अंतरराष्ट्रीय संगठन एक्शन अगेंस्ट हंगर की रिपोर्ट के हवाले से सामने आए आंकड़े इसी गंभीर चुनौती की ओर संकेत करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में पाकिस्तान में लगभग 1.06 करोड़ लोगों को मानवीय सहायता की आवश्यकता हो सकती है। हालांकि, इस आंकड़े को खाद्य सहायता की जरूरत के बराबर मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि मानवीय सहायता में भोजन के अलावा स्वास्थ्य और दूसरी बुनियादी जरूरतें भी शामिल होती हैं।
पड़ोसी देश पाकिस्तान उन देशों में शामिल है, जहां खाद्य संकट के पीछे कई समस्याएं एक साथ काम कर रही हैं। महंगाई ने आम परिवारों की क्रय शक्ति कमजोर की है, बेरोजगारी और घटती आय ने भोजन खरीदने की क्षमता घटाई है, जबकि बाढ़, सूखा और अन्य जलवायु आपदाओं ने खेती तथा आजीविका पर दबाव बढ़ाया है। जब इन परिस्थितियों के बीच अंतरराष्ट्रीय सहायता भी जरूरत के मुकाबले कम पड़ती है, तो सबसे अधिक कीमत गरीब परिवारों को चुकानी पड़ती है।
भुखमरी सिर्फ़ भोजन की कमी नहीं, व्यवस्था की विफलता
दुनिया में खाद्य संकट की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नाइजीरिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, सूडान, यमन, अफगानिस्तान, म्यांमार, बांग्लादेश, पाकिस्तान, दक्षिण सूडान और सीरिया जैसे देशों में लाखों लोगों की खाद्य उपलब्धता और पोषण गंभीर चुनौती बने हुए हैं। अलग-अलग देशों में संकट के कारण अलग हैं। कहीं युद्ध और विस्थापन ने खाद्य आपूर्ति बाधित की है, तो कहीं आर्थिक अस्थिरता, प्राकृतिक आपदाओं और कमजोर सामाजिक सुरक्षा ने लोगों को असुरक्षित बनाया है। वैश्विक खाद्य संकट पर प्रकाशित आकलनों में गंभीर खाद्य असुरक्षा के बढ़ने की चेतावनी दी गई है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। भोजन की कमी, खाद्य असुरक्षा और अकाल एक ही बात नहीं हैं। खाद्य असुरक्षा का अर्थ है कि लोगों को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन नियमित रूप से उपलब्ध नहीं हो पा रहा। अकाल घोषित करने के लिए मृत्यु दर, कुपोषण और भोजन की उपलब्धता जैसे कठोर मानदंड पूरे होने चाहिए। पाकिस्तान की चुनौती इसलिए भी गंभीर है कि खाद्य पदार्थ बाजार में मौजूद होने के बावजूद बड़ी आबादी उन्हें खरीदने में सक्षम नहीं हो सकती। परिवार भोजन की मात्रा घटाते हैं, पौष्टिक चीजों के स्थान पर सस्ता भोजन अपनाते हैं, संपत्ति बेचते हैं और कभी-कभी बच्चों की पढ़ाई तक छुड़वा देते हैं। यह केवल भूख का संकट नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य, शिक्षा और उत्पादकता पर पड़ने वाला दीर्घकालिक प्रहार है।
भारत के लिए खतरे की घंटी क्यों?
पाकिस्तान की स्थिति देखकर भारत को संतोष करने के बजाय अपनी खाद्य सुरक्षा की समीक्षा करनी चाहिए। भारत की स्थिति पाकिस्तान से अलग है। यहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद, भारतीय खाद्य निगम के भंडार और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम जैसे संस्थागत प्रबंध मौजूद हैं। सरकार की खाद्यान्न वितरण व्यवस्था के तहत पात्र परिवारों को अनाज उपलब्ध कराया जाता है। अगस्त 2025 में केंद्र सरकार ने संसद को बताया था कि केंद्रीय पूल में गेहूं का भंडार 342.80 लाख मीट्रिक टन और चावल का भंडार 381.76 लाख मीट्रिक टन था। ये उस अवधि के निर्धारित भंडारण मानकों से अधिक थे। यह भारत की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की क्षमता का महत्वपूर्ण संकेत है, हालांकि इन आंकड़ों को अक्टूबर 2026 के मौजूदा भंडार का प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन केवल सरकारी गोदामों में अनाज का होना पर्याप्त नहीं है। असली कसौटी यह है कि जरूरतमंद परिवारों तक समय पर अनाज पहुंचे, उसकी गुणवत्ता बनी रहे और महंगाई के कारण कोई व्यक्ति पौष्टिक भोजन से वंचित न हो। राशन वितरण में गड़बड़ियां, पात्र परिवारों की छूट, कुपोषण और गरीबों की सीमित आय जैसी समस्याओं पर लगातार निगरानी जरूरी है।भारत के सामने जलवायु परिवर्तन भी बड़ी चुनौती है। अनियमित मानसून, अत्यधिक गर्मी, सूखा और बाढ़ फसलों की पैदावार को प्रभावित कर सकते हैं। यदि गेहूं और चावल का उत्पादन प्रभावित होता है, तो उसका असर सरकारी खरीद, खाद्यान्न भंडार और बाजार की कीमतों पर भी पड़ सकता है। इसलिए अनाज के भंडार के साथ-साथ दलहन, तिलहन और मोटे अनाज का उत्पादन बढ़ाना, पानी की बचत करने वाली खेती को प्रोत्साहित करना और भंडारण तथा परिवहन की व्यवस्था मजबूत करना आवश्यक है।
तैयारी का मतलब केवल अनाज जमा करना नहीं
भारत को तीन मोर्चों पर गंभीरता से काम करना होगा। पहला, खाद्यान्न भंडार और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत बनाए रखना। दूसरा, गरीब परिवारों की क्रय शक्ति बढ़ाना, ताकि भोजन बाजार में उपलब्ध होने के बावजूद वे भूखे न रहें। तीसरा, जलवायु संकट और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति में व्यवधान से निपटने के लिए कृषि व्यवस्था को अधिक लचीला बनाना।वैश्विक तस्वीर भी चेतावनी दे रही है। एक्शन अगेंस्ट हंगर की 15 अक्टूबर 2026 को जारी रिपोर्ट के अनुसार, 47 देशों और क्षेत्रों में 26.6 करोड़ लोग 2025 में गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे थे। रिपोर्ट यह भी बताती है कि पिछले दशक में गंभीर भूख का स्तर दोगुने से अधिक हो गया है और मानवीय सहायता में कमी से संकटग्रस्त आबादी की मुश्किलें बढ़ रही हैं। बहरहाल, भारत को यह समझना होगा कि खाद्य सुरक्षा केवल कृषि मंत्रालय या खाद्य आपूर्ति विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। यह अर्थव्यवस्था, रोजगार, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय से भी जुड़ा प्रश्न है। भूख मिटाने के लिए अनाज पैदा करना जरूरी है, लेकिन लोगों के पास उसे खरीदने की क्षमता होना भी उतना ही आवश्यक है। कहने की बात यह है कि पाकिस्तान का खाद्य संकट भारत के लिए राजनीतिक तंज का नहीं, नीतिगत सबक का विषय होना चाहिए। आज भारत के पास खाद्यान्न उत्पादन और वितरण का व्यापक ढांचा है, लेकिन भविष्य की चुनौतियां इस व्यवस्था की निरंतर परीक्षा लेंगी। असली सफलता तब होगी, जब किसी गरीब परिवार को भोजन के लिए अपनी संपत्ति न बेचनी पड़े, किसी बच्चे की पढ़ाई भूख के कारण न छूटे और किसी नागरिक को दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष न करना पड़े। खाद्य सुरक्षा का अंतिम पैमाना सरकारी गोदामों का आकार नहीं, बल्कि हर नागरिक की थाली में उपलब्ध भोजन है।
(लेखक “दैनिक भास्कर” के राजनीतिक संपादक हैं)
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