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    गेहूं के भाव में जबरदस्त उछाल, ₹3100 प्रति क्विंटल के पार पहुंची कीमत

    नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के थोक बाजार में गेहूं की कीमतों में लगातार तेजी का रुख बना हुआ है और भाव उछलकर इकतीस सौ रुपये प्रति क्विंटल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं। यह मौजूदा सीजन का अब तक का सबसे उच्चतम स्तर दर्ज किया गया है। सरकार द्वारा ओपन मार्केट सेल स्कीम (ओएमएसएस) के तहत दूसरी बिक्री निविदा जारी किए जाने के बावजूद बाजार में अनाजों के दाम कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं, जिससे खरीदार और कारोबारी दोनों चिंतित हैं।

    कीमतों में लगातार उछाल और ओएमएसएस का प्रभाव

    विशेषज्ञों के अनुसार जब सरकार ने ओएमएसएस के तहत दूसरी निविदा की घोषणा की थी, तब गेहूं का बाजार भाव उनतीस सौ सत्तर रुपये प्रति क्विंटल के आसपास था, जो बढ़कर अब इकतीस सौ रुपये पर पहुंच चुका है। इस प्रकार पिछले कुछ ही दिनों में कीमतों में एक सौ तीस रुपये प्रति क्विंटल तक की बढ़ोतरी दर्ज की जा चुकी है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि ओएमएसएस की प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद दामों में यह तेजी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि खुले बाजार में गेहूं की मांग मजबूत बनी हुई है, जबकि इसके मुकाबले मांग के अनुरूप पर्याप्त उपलब्धता कम है।

    मांग और आपूर्ति का असंतुलन तथा बढ़ती मांग

    ओएमएसएस के तहत खुले बाजार में गेहूं की बिक्री में हुई देरी के कारण निजी व्यापारियों और बड़े स्टॉकिस्टों के पास मौजूद स्टॉक लगातार घटता चला गया है। इसके विपरीत, त्योहारी सीजन के दौरान घरेलू बाजार में आटे और गेहूं की मांग में जबरदस्त इजाफा देखा जा रहा है। इसके साथ ही पड़ोसी देश बांग्लादेश से भी लगातार निर्यात मांग बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में वैश्विक आपूर्ति बाधित होने और घरेलू कीमतें अधिक होने के कारण वर्तमान में केवल बांग्लादेश ही भारतीय गेहूं की ओर रुख कर रहा है।

    सरकारी स्टॉक की स्थिति और भविष्य का परिदृश्य

    भले ही खुले बाजार में कीमतों पर दबाव बना हुआ है, लेकिन सरकारी आंकड़ों के मुताबिक केंद्रीय पूल में गेहूं का स्टॉक बेहद मजबूत और आरामदायक स्थिति में है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार केंद्रीय पूल में भारी मात्रा में गेहूं का सुरक्षित भंडार उपलब्ध है, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि के मुकाबले काफी अधिक है। हालांकि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में हुई बढ़ोतरी के कारण भारतीय गेहूं की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजारों के मुकाबले ऊंची हैं, जिससे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में इसकी स्थिति सीमित हुई है और बाजार का पूरा दारोमदार अब आगामी सरकारी नीतियों पर टिका हुआ है।

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