जीवन में कषायों की लकीरें मिटानी हैं तो अपनाएं ‘जाने दो’ का मंत्र, सूर्यमहल में चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान आचार्य ने परिवार, क्षमा और समता का दिया संदेश
भीलवाड़ा। हम अब तक जिंदगी अपने लिए जीए हैं, अब परिवार के अन्य सदस्यों के लिए भी जीकर देखें। दूसरों के लिए जीने से बड़ा संसार में कोई धर्म नहीं हो सकता। यह प्रेरक संदेश राष्ट्रसंत मनोज्ञाचार्य आचार्य पुलकसागर महाराज ने शनिवार को शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में दिया। श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मुख्य सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से आयोजित चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला जीवन जीने की कला के चौथे दिन उनकी मंगल दिव्य देशना हुई।
आचार्यश्री ने कहा कि परिवार के सदस्य यदि एक-दूसरे के लिए जीना सीख लें, तो पारिवारिक जीवन में प्रेम, विश्वास और आत्मीयता बढ़ सकती है। परिवार के साथ समय बिताने से जीवन का वास्तविक आनंद मिलता है। उन्होंने कहा कि जीवन की परेशानियों के लिए दुकान नहीं चलने या घर का वास्तु ठीक नहीं होने जैसे कारणों को जिम्मेदार ठहराने के बजाय व्यक्ति को अपनी कमियों को पहचानकर उनमें सुधार करना चाहिए।
क्षमा मांगने से कोई छोटा नहीं होता
आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि किसी से क्षमा मांगने या अपनी गलती स्वीकार करने से व्यक्ति छोटा नहीं हो जाता। बड़ा बनकर कठोर होने की बजाय विनम्र होकर मधुर व्यवहार करना अधिक श्रेष्ठ है। धर्म की शुरुआत अपने घर से होनी चाहिए और इसके लिए तीर्थंकरों के चरित्र का अध्ययन करना चाहिए।
रामायण और महाभारत के प्रसंगों के माध्यम से उन्होंने निस्वार्थ भाव और स्वार्थ के अंतर को समझाया। उन्होंने कहा कि रामायण दूसरों के लिए जीने की प्रेरणा देती है। व्यक्ति को यह भी विचार करना चाहिए कि बच्चे अपने मन की बातें माता-पिता से साझा करने के बजाय दूसरों को क्यों बताते हैं। जब हम इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करेंगे, तब अपने व्यवहार और संबंधों को बेहतर बनाने का अवसर मिलेगा।
क्रोध और विवाद के समय याद रखें जाने दो का मंत्र
आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में कषायों यानी क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी प्रवृत्तियों को कम करना है, तो जाने दो के मंत्र को अपनाना होगा। जब किसी बात पर बहुत गुस्सा आए या कोई विवाद करने लगे, तब प्रतिक्रिया देने से पहले मन में ‘जाने दो’ का भाव लाकर देखें।
उन्होंने कहा कि छोटी-छोटी बातों को तूल देने के बजाय उन्हें अनदेखा करना सीखना चाहिए। इससे मन शांत रहेगा और जीवन में सहजता बढ़ेगी। कषायों पर विजय पाने के लिए धैर्य, क्षमा और समता का अभ्यास आवश्यक है।
माता-पिता को सम्मान और सुकून भरा जीवन देना ही सच्ची सेवा
माता-पिता की सेवा का महत्व बताते हुए आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि जीवन के अंतिम समय में नवकार मंत्र सुनाने के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि माता-पिता को जीवनभर सुख, सम्मान और संतोष दिया जाए। उन्हें अंतिम समय तक सुकून भरा जीवन देना ही सच्ची सेवा का महत्वपूर्ण रूप है।
उन्होंने कहा कि बुद्धि को समता में ढाल लेना ही समाधि का भाव है। यदि परिवार में संबंध प्रेम, सम्मान और सहजता से निभाए जाएं, तो जीवन के अंतिम समय में भी मन की शांति बनी रह सकती है।
पाद प्रक्षालन और शास्त्र भेंट का मिला सौभाग्य
श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि प्रवचन के प्रारंभ में पाद प्रक्षालन और शास्त्र भेंट का सौभाग्य अशोक कुमार, हीरामणी, अमित और गौरव चौधरी परिवार को प्राप्त हुआ। कार्यक्रम का संचालन चातुर्मास समिति के महामंत्री जयकुमार पाटनी ने किया।
समिति के संयोजक मनीष शाह और सह संयोजक लोकेश अजमेरा ने बताया कि 30 अक्टूबर तक प्रतिदिन सुबह 8:45 से 10 बजे तक आचार्यश्री की दिव्य देशना होगी। इसके साथ ही प्रतिदिन शाम 6:30 से 7:30 बजे तक आनंद यात्रा (प्रश्न मंच) आयोजित की जा रही है, जिसमें शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होकर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।
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