अहमदाबाद। भारत के प्रथम गृह मंत्री और 'लौह पुरुष' के नाम से प्रख्यात सरदार वल्लभभाई पटेल की 151वीं जयंती पूरे देश में 'राष्ट्रीय एकता दिवस' के रूप में मनाई जा रही है। स्वतंत्र और अखंड भारत के निर्माण में उनकी ऐतिहासिक भूमिका आज भी राष्ट्र की मजबूत नींव के रूप में कायम है। उनका जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में जवेरभाई और लाडबा के किसान परिवार में हुआ था। करमसद के स्थानीय स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने 1897 में नडियाद से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की।
इंग्लैंड में 30 महीने में पूरा किया 36 महीने का कानून पाठ्यक्रम
पारिवारिक परिस्थितियां कठिन होने के कारण उन्होंने महंगी कॉलेज शिक्षा के बजाय जिला वकील की परीक्षा पास कर वकालत शुरू की। इसके बाद अगस्त 1910 में वे अपनी कानूनी पढ़ाई को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए इंग्लैंड चले गए। लंदन के प्रतिष्ठित 'मिडल टेम्पल' में प्रवेश लेकर उन्होंने 36 महीने का कठिन पाठ्यक्रम महज 30 महीने में प्रथम श्रेणी से पूरा किया। वर्ष 1913 में स्वदेश लौटने के बाद उन्होंने अहमदाबाद में वकालत की शुरुआत की।
पारिवारिक जीवन और गंभीर व्यक्तिगत क्षति
वर्ष 1893 में वल्लभभाई पटेल का विवाह जवेरबा पटेल से हुआ। दंपत्ति की दो संतानें थीं—पुत्री मणिबेन पटेल (जन्म 1904) और पुत्र डाह्याभाई पटेल (जन्म 1905)। वर्ष 1909 में गंभीर बीमारी (कैंसर) के कारण उनकी पत्नी जवेरबा का असमय निधन हो गया। पत्नी के देहांत के पश्चात उन्होंने जीवन भर दूसरा विवाह नहीं किया और अपना संपूर्ण जीवन देश व समाज सेवा को समर्पित कर दिया।
अदालत में कर्तव्यनिष्ठा का अद्भुत उदाहरण
उनकी पत्नी के निधन से जुड़ी एक घटना उनके अदम्य चरित्र और अभूतपूर्व कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल मानी जाती है। वर्ष 1909 में जब उनकी पत्नी अस्पताल में अंतिम सांसें ले रही थीं, तब वल्लभभाई अदालत में एक महत्वपूर्ण केस पर बहस कर रहे थे। उसी दौरान उन्हें पत्नी के देहांत की सूचना वाली एक पर्ची थमाई गई। उन्होंने पर्ची पढ़कर चुपचाप अपनी जेब में रख ली और बिना किसी विचलन के अदालत की बहस जारी रखी। केस जीतने और अदालती कार्यवाही समाप्त होने के बाद ही उन्होंने दूसरों को इस दुखद घटना की जानकारी दी, जिसे सुनकर उपस्थित सभी लोग स्तब्ध रह गए।


