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    25 साल बाद फिर चर्चा में ‘सीताराम केसरी’, मोदी के हमले और राहुल की श्रद्धांजलि से सियासत गरमाई

    नई दिल्‍ली । बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) की तारीखें जैसे-जैसे नजदीक आती जा रही हैं, वैसे-वैसे चुनाव प्रचार (election campaign) ने अब जोर पकड़ना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने आज बेगूसराय में एक चुनावी रैली को संबोधित किया, जिसमें उन्होंने कांग्रेस के भूतपूर्व अध्यक्ष सीताराम केसरी (Sitaram Kesri) की चर्चा की। दरअसल, आज (शुक्रवार को) सीताराम केसरी की 25वीं पुण्यतिथि है। इसी बहाने पीएम मोदी ने मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पर तीखा प्रहार किया और कहा, ‘‘कांग्रेस में एक परिवार है जो देश का सबसे भ्रष्ट परिवार है। उन्होंने अपने ही पूर्व अध्यक्ष सीताराम केसरी को बाथरूम में बंद कर दिया था और फिर सड़क पर फेंक दिया था। ऐसे लोग लोकतंत्र और सम्मान की बात करते हैं।’’

    दूसरी तरफ, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सीताराम केसरी को उनकी पुण्यतिथि के मौके पर याद किया और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी पार्टी के पुराने मुख्यालय ’24 अकबर रोड’ पहुंचे और वहां केसरी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। केसरी बिहार में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में से एक रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनाव के बीच केसरी की पुण्यतिथि पर पिछले 25 साल में शायद पहला अवसर है, जब गांधी ने उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किए हैं।

    कौन थे सीताराम केसरी?
    सीताराम केसरी का जन्म 15 नवंबर, 1919 को पटना जिले के दानापुर में हुआ था। वह अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कांग्रेस में कई पदों पर रहे और 1996 से 1998 तक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। केसरी के बाद सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान संभाली थी। केसरी का निधन 24 अक्टूबर, 2000 को हुआ था। केसरी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बिहार कांग्रेस के युवा तुर्कों का हिस्सा थे। वह कई बार जेल गए थे। 1973 में वह बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और सात साल बाद अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष बने। इस पद पर वह लंबे समय तक रहे। केसरी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और नरमिन्हा राव के कार्यकाल में केंद्रीय मंत्री भी रहे।

    कांग्रेस अध्यक्ष पद पर ताजपोशी फिर अपमान
    1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने। सोनिया गांधी ने कोई पद लेने से इनकार कर दिया था, इसके बाद राव ही कांग्रेस के अध्यक्ष भी बन गए। लेकिन पांच साल के कार्यकाल में सोनिया और राव के बीच कई मुद्दों पर मतभेद गहरे हो गए। इनमें बोफोर्स कांड में राजीव गांधी के खिलाफ मामला खारिज करने के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देना और बाबरी विध्वंस रोक पाने में अनिच्छा और नाकामी भी शामिल है। 1996 में जब लोकसभा चुनाव हुए तो सोनिया गांधी ने चुनाव प्रचार करने से इनकार कर दिया। इससे कांग्रेस पार्टी हार गई। फिर राव ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ दिया। इसके बाद सीताराम केसरी की ताजपोशी कांग्रेस अध्यक्ष पद पर हुई।

    चचा केसरी से बढ़ी लालू-मुलायम की नजदीकियां
    सीताराम केसरी राजनीतिक गलियारों में खासकर यूपी-बिहार में चचा केसरी नाम से मशहूर थे। कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यकाल में चचा केसरी की नजदीकी मुलायम सिंह यादव, कांशीराम, लालू यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार जैसे यूपी-बिहार के पिछड़ी जाति के नेताओं से बढ़ी तो कांग्रेस खेमे में यह बात उठी कि वह कांग्रेस का मंडलीकरण कर रहे हैं। जब उन्होंने 1997 में एचडी देवगौड़ा की सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो उनकी दूरियां सोनिया से और बढ़ गईं। हालांकि, उन्होंने फिर इन्दर कुमार गुजराल सरकार को समर्थन दिया।

    ऐसे गिरी गुजराल सरकार
    नवंबर 1997 में एक और घटना घटी। राजीव गांधी की हत्या में साजिश के पहलू की जाँच करने वाली जैन आयोग की रिपोर्ट का एक अंश प्रेस में लीक हो गया ता। खबर यह थी कि जैन आयोग ने डीएमके को हत्या में शामिल लिट्टे के साथ संबंधों के लिए दोषी ठहराया था। डीएमके के तीन सदस्य उस समय गुजराल के मंत्रिमंडल का हिस्सा थे। केसरी ने डीएमके के मंत्रियों को हटाने की माँग की, लेकिन प्रधानमंत्री गुजराल इससे सहमत नहीं हुए। इसके बाद कांग्रेस ने संयुक्त मोर्चा सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। 1998 में जब लोकसभा चुनाव होने लगे तब, सोनिया ने पार्टी के मुख्य प्रचारक की भूमिका ले ली, जबकि सीताराम केसरी को प्रचार से दूर रखा गया।

    भीड़ जुटी, पर कांग्रेस हार गई
    सोनिया की सभाओं में भीड़ जुटी लेकिन पार्टी हार गई। इसके लिए सीताराम केसरी को जिम्मेदार ठहराया गया। शरद पवार, प्रणब मुखर्जी, जितेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं ने बैठकें लेनी शुरू कर दीं। 5 मार्च 1998 को CWC की बैठक हुई। इसके चार दिन बाद केसरी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। हालांकि, फिर उसे वापस ले लिया। फिर 14 मार्च 1998 को कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड में ऐसा कुछ हुआ जो सीताराम केसरी की कल्पना से परे था। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, जह केसरी पार्टी दफ्तर पहुंचे तो किसी ने उनका स्वागत नहीं किया। कोई खड़ा भी नहीं हुआ। केसरी तब लाल हो गए, जब प्रणब मुखर्जी ने सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव पेश कर दिया। इससे नाराज होकर केसरी वहां से जाने लगे। कुछ लोगों को कहना है कि तभी वहां मौजूद कुछ लोगों ने सीताराम केसरी की धोती खींची थी। यह भी कहा जाता है कि सोनिया के कमान संभालने तक केसरी को घंटों बाथरूम में बंद रखा गया था, जिसकी पीएम मोदी चर्चा कर रहे थे।

    केसरी की चर्चा क्यों जरूरी, क्या मजबूरी?
    दरअसल, सीताराम केसरी की चर्चा बिहार चुनावों से ऐन पहले इसलिए की जा रही है ताकि चुनावों में पिछड़े वर्ग का ध्रुवीकरण हो सके और यह कोशिश दोनों तरफ से हो रही हैं। चूंकि केसरी पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते थे। इसलिए उनके बहाने पीएम मोदी पिछड़ी जातियों को यह बताना चाहते हैं कि कांग्रेस उनकी शुभचिंतक नहीं है, जबकि राहुल गांधी चचा केसरी को पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देकर यह बताना चाहते हैं कि पार्टी केसरी के साथ-साथ पिछड़ों का भी सम्मान करती है। बता दें कि बिहार में EBC और OBC की कुल आबादी 63 फीसदी है। इनमें OBC 27 और EBC करीब 36 फीसदी है। बहरहाल, बिहार चुनाव में इस बड़ी आबादी को अपनी-अपनी तरफ खींचने की कोशिशें जारी हैं।

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