पर्यावरणविद बाबूलाल जाजू की याचिका पर परिवहन आयुक्त, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित 6 अधिकारियों को नोटिस जारी
मिशनसच न्यूज,भीलवाड़ा। राजस्थान में लगातार बढ़ते वाहन प्रदूषण और वाहनों से वसूले जा रहे ग्रीन टैक्स की राशि के कथित दुरुपयोग को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है। पर्यावरणविद बाबूलाल जाजू द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी की सेंट्रल ज़ोन बेंच, भोपाल ने राज्य सरकार से ग्रीन टैक्स की वसूली और उसके उपयोग को लेकर विस्तृत जवाब तलब किया है। न्यायाधिपति शिवकुमार सिंह एवं एक्सपर्ट मेंबर सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर संयुक्त जांच समिति के गठन के निर्देश दिए हैं।
एनजीटी में 8 जनवरी 2026 को हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता बाबूलाल जाजू की ओर से अधिवक्ता लोकेन्द्र सिंह कच्छावा ने पक्ष रखते हुए बताया कि राजस्थान में वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में वाहन उत्सर्जन के कारण वायु गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है, जिससे दमा, ब्रोंकाइटिस, सीओपीडी और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों में तेजी से वृद्धि हो रही है। इसका सबसे अधिक प्रभाव बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं पर पड़ रहा है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि राजस्थान सरकार ने वर्ष 2017 में पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण के उद्देश्य से वाहनों पर ग्रीन टैक्स लागू किया था। सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2015-16 से 2024-25 तक राज्य सरकार द्वारा लगभग ₹2009.66 करोड़ की राशि ग्रीन टैक्स के रूप में वसूली गई है। लेकिन आरोप है कि इस विशाल राशि का उपयोग न तो हरियाली बढ़ाने में किया गया और न ही वायु प्रदूषण नियंत्रण की ठोस योजनाओं में।
बाबूलाल जाजू ने याचिका में यह भी बताया कि आजादी के समय राजस्थान में लगभग 13 प्रतिशत भूमि वन क्षेत्र से आच्छादित थी, जो अब घटकर करीब 9 प्रतिशत रह गई है। वहीं वनों की सघनता 0.8 से गिरकर 0.3 रह गई है। ऐसे में यदि ग्रीन टैक्स की राशि का सही उपयोग वृक्षारोपण, हरित पट्टियों के विकास और प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाओं में किया जाता, तो आज राज्य के कई शहर जहरीली हवा की समस्या से जूझ नहीं रहे होते।
मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए एनजीटी ने सचिव, रोड ट्रांसपोर्ट एवं हाईवे मंत्रालय, परिवहन आयुक्त राजस्थान, सदस्य सचिव राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, प्रमुख सचिव पर्यावरण विभाग, प्रमुख सचिव नगरीय विकास विभाग और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को नोटिस जारी किए हैं। इन सभी विभागों से ग्रीन टैक्स की वसूली, उसके उपयोग और प्रदूषण नियंत्रण के लिए उठाए गए कदमों पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है।
इसके साथ ही एनजीटी ने एक संयुक्त जांच समिति का गठन भी किया है। इस समिति में पर्यावरण विभाग, परिवहन विभाग, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रतिनिधि शामिल किए गए हैं। समिति को निर्देश दिए गए हैं कि वह संबंधित स्थलों का निरीक्षण कर ग्रीन टैक्स की राशि के उपयोग, वायु प्रदूषण की वर्तमान स्थिति और नियंत्रण उपायों की वास्तविक स्थिति की जांच कर छह सप्ताह के भीतर रिपोर्ट एनजीटी को प्रस्तुत करेगी।
एनजीटी ने स्पष्ट किया है कि यदि ग्रीन टैक्स जैसी पर्यावरण संरक्षण की राशि का उपयोग उद्देश्य के विपरीत किया गया है, तो यह गंभीर विषय है और इस पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 23 मार्च 2026 को निर्धारित की गई है।
याचिकाकर्ता बाबूलाल जाजू ने कहा कि यदि सरकार द्वारा वसूली गई ग्रीन टैक्स की राशि का पारदर्शी और सही उपयोग होता, तो आज राजस्थान के कई शहर प्रदूषण की भयावह स्थिति से बच सकते थे। उन्होंने मांग की कि ग्रीन टैक्स की पूरी राशि का उपयोग केवल प्रदूषण नियंत्रण, वृक्षारोपण, हरित क्षेत्र विकास और पर्यावरण संरक्षण के कार्यों में ही किया जाए तथा इसकी नियमित सार्वजनिक ऑडिट रिपोर्ट भी जारी की जाए।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि एनजीटी का यह कदम राज्य में पर्यावरणीय जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यदि जांच में अनियमितता सामने आती है, तो आने वाले समय में राज्य की प्रदूषण नीति और ग्रीन टैक्स प्रबंधन में बड़े बदलाव संभव हैं।
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