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    पद को लेकर बीजेपी–शिवसेना गठबंधन में टकराव, बाल ठाकरे की सियासी विरासत का भी है मामला

    मुंबई। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के चुनाव चार साल की देरी के बाद संपन्न हो चुके हैं, लेकिन मेयर पद को लेकर महायुति गठबंधन में तनाव गहरा गया है। भाजपा और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के बीच इस पद को लेकर मतभेद अब खुलकर सामने आ गए हैं। विवाद केवल सत्ता के पद तक सीमित नहीं है, बल्कि शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत को लेकर भी बहस का केंद्र बन गया है।
    शिंदे गुट का कहना है कि बीएमसी मेयर पद को रोटेशन के आधार पर बांटा जाना चाहिए और पांच साल के कार्यकाल में पहले ढाई साल तक शिवसेना का मेयर होना चाहिए। उनका तर्क है कि 2026 बाल ठाकरे का जन्म शताब्दी वर्ष है और इस मौके पर मुंबई का मेयर एक शिवसैनिक होना बालासाहेब को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। शिंदे खुद मुख्यमंत्री पद गंवाने के बाद सत्ता में हाशिये पर महसूस कर रहे हैं, जिससे यह मांग और भी संवेदनशील बन गई है।
    बीएमसी चुनावों में 227 सदस्यीय सदन में भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि शिंदे गुट की शिवसेना को 29 सीटें मिलीं। दोनों मिलकर 118 सीटों के साथ बहुमत के आंकड़े से ऊपर हैं। विपक्षी शिवसेना (यूबीटी) ने 65 सीटें जीतकर मजबूत उपस्थिति दर्ज की है। बावजूद इसके, महायुति गठबंधन अब तक बीएमसी के लिए औपचारिक नेतृत्व तय नहीं कर पाई है।
    गठबंधन में विवाद तब खुलकर सामने आया, जब शिंदे गुट ने अचानक अपने 29 पार्षदों का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया। इसके बाद डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ प्रस्तावित बैठक और अहम कैबिनेट मीटिंग में हिस्सा नहीं लिया। शिंदे का अपने पैतृक गांव लौटना और उनके समर्थक मंत्रियों का बैठक से दूरी बनाना नाराजगी का संकेत माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, भाजपा शिंदे शिवसेना को ठाणे नगर निगम और बीएमसी की स्थायी समिति जैसे अहम निकायों में भूमिका देने का विकल्प सोच रही है, ताकि मेयर पद पर सहमति बनाई जा सके। हालांकि, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने सार्वजनिक तौर पर मतभेदों से इनकार किया और कहा कि जल्द ही महायुति का मेयर आम सहमति से चुना जाएगा।
    इस पूरे विवाद के बीच बाल ठाकरे की विरासत राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई है। शिंदे गुट इसे “असली शिवसेना” की पहचान के साथ जोड़कर देख रहा है, जबकि उद्धव ठाकरे गुट आरोप लगाता है कि बालासाहेब की विरासत के नाम पर दिल्ली के सामने झुककर फैसले लिए जा रहे हैं। स्पष्ट है कि बीएमसी मेयर का फैसला केवल मुंबई की नगर राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि महाराष्ट्र की सत्ता और शिवसेना की पहचान तय करने वाला साबित हो सकता है।

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