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    जब अजित पवार बने चाचा की ढाल: कैसे बची शरद पवार की रक्षा मंत्री की कुर्सी, बारामती सीट स्वैपिंग की पूरी कहानी

    नई दिल्‍ली । बात 1991 की है। देश में लोकसभा के चुनाव हो रहे थे। इसी बीच पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) की लिट्टे उग्रवादियों ने एक आत्मघाती बम विस्फोट में हत्या कर दी। देश का राजनीतिक मिजाज बदल गया और उन चुनावों में कांग्रेस पार्टी की जीत हुई। पीवी नरसिम्हा राव (P.V. Narasimha Rao) को प्रधानमंत्री बनाया गया। उस समय प्रधानमंत्री राव ने क्षेत्रीय छत्रपों का संतुलन बिठाते हुए कई दिग्गजों को अपने मंत्रिमंडल में जगह दी थी। उन्हीं में एक थे शरद पवार (Sharad Pawar), जिन्हें रक्षा मंत्री बनाया गया था लेकिन जब उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई थी, तब वह संसद के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे।

    शरद पवार उस समय महाराष्ट्र विधानसभा में बारामती से विधायक थे, जबकि उनके भतीजे अजित पवार पहली बार बारामती संसदीय सीट से चुनकर सांसद बने थे। संविधान के नियमानुसार छह महीने के अंदर शरद पवार को संसद के किसी भी सदन का सदस्य बनना था। अन्यथा रक्षा मंत्री की कुर्सी खतरे में थी। ऐसे में भतीजे अजित पवार ने अपनी सांसदी छोड़ दी। उधर, शरद पवार ने भी अपनी विधायकी छोड़ दी। इसके बाद बारामती में सांसद और विधायक दोनों के लिए नवंबर 1991 में उप चुनाव हुए। शरद पवार भतीजे की छोड़ी सीट पर सांसद बन गए और अजित पवार चाचा द्वारा छोड़ी गई MLA की सीट पर जीतकर पहली बार महाराष्ट्र विधानसभा पहुंचे।

     

    अजित मुंबई तो शरद पवार दिल्ली में जमे
    महाराष्ट्र की राजनीति में 1991 का बारामती सीट स्वैप आज भी एक अनोखे और निर्णायक अध्याय के रूप में याद किया जाता है। यह वही दौर था, जब एक युवा नेता अजित पवार ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत में ही ऐसा फैसला लिया, जिसने उनके चाचा शरद पवार को देश का रक्षा मंत्री बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। दिल्ली की राजनीति में बने रहने के लिए शरद पवार का सांसद बनना अनिवार्य था। इस तरह, अजित पवार विधानसभा में पहुंचे और शरद पवार ने दिल्ली में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी।

    अजित पवार: राजनीति में शुरुआती त्याग
    बारामती दशकों से पवार परिवार का गढ़ रहा है। ऐसे में सीट बदलने का फैसला जोखिम भरा नहीं था। बड़ी बात यह है कि 1991 में अजित पवार महज 32 साल के थे। उन्होंने उसी साल लोकसभा चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार को भारी मतों से हराया था। लेकिन चाचा के राजनीतिक भविष्य और पारिवारिक विश्वास के चलते उन्होंने बिना हिचक अपनी सीट छोड़ दी। सीट स्वैपिंग के बाद विधायक बने अजित पवार को तब महाराष्ट्र सरकार में राज्य मंत्री बनाया गया था और यहीं से उनका लंबा और प्रभावशाली राजनीतिक सफर शुरू हुआ।

    दंगा, दिल्ली और वापसी
    1992-93 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुंबई में भयानक दंगे हुए। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक हालात बिगड़ने पर शरद पवार को दिल्ली छोड़कर फिर से महाराष्ट्र की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की कमान संभाली, जबकि अजित पवार बारामती से लगातार मजबूत होते चले गए।

    बारामती और अजित पवार: अटूट रिश्ता
    1991 के बाद से बारामती विधानसभा सीट से अजित पवार कभी भी चुनाव नहीं हारे। वह यहीं से विधायक बनकर वित्त मंत्री, उपमुख्यमंत्री जैसे बड़े पदों पर रहे। उनकी पूरी राजनीति बारामती से जुड़ी रही और संयोग ऐसा कि उनकी मौत भी बारामती में ही हुई। उस अदला-बदली के लगभग 35 साल बाद, अजित पवार की बुधवार को बारामती में एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। लेकिन वह अब 1991 की तरह राजनीतिक नौसिखिया नहीं थे। अजीत पवार अपने आप में महाराष्ट्र के शक्तिशाली नेताओं में से एक थे।

    अजित पवार की मृत्यु ने उनके राजनीतिक जीवन के 1991 के दिलचस्प अध्याय पर ध्यान खींचा है। सीटों की अदला-बदली ने महाराष्ट्र की राजनीति और अजित पवार के करियर को आकार दिया। अजित पवार के जुलाई 2023 में चाचा शरद से अलग होने और NCP के टूटने की ताज़ा यादों को देखते हुए, आज कई लोगों को 1991 की बारामती सीट की अदला-बदली दिलचस्प लग सकती है।

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