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    चौरागढ़ महादेव की खातिर, वजनदार त्रिशूल लेकर भक्तों की सतपुड़ा के पहाड़ों पर चढ़ाई

    छिंदवाड़ा: शिवरात्रि पर भगवान शंकर के शस्त्र त्रिशूल का खास महत्व होता है. लोग इसे कुछ अपनी खुशी से तो कुछ मन्नत के बाद भगवान को अर्पण करते हैं. छिंदवाड़ा का एक परिवार ऐसा है जो दो पीढ़ियों से त्रिशूल बनाने का काम कर रहा है. महाशिवरात्रि के मौके पर लोग आते हैं और यहां से त्रिशूल खरीद कर चौरागढ़ महादेव में अर्पित करते हैं. क्या है त्रिशूल की महिमा क्यों शंकर भगवान को प्रिय है त्रिशूल.

    छिंदवाड़ा में त्रिशूल का मार्केट, परिवार पीढ़ियों से कर रहे काम
    दो पीढ़ियों से त्रिशूल बनाने का काम कर रहे मुन्ना विश्वकर्मा ने बताया है कि, ''पहले उनके पिता यह काम करते थे अब वे कर रहे हैं. खास बात यह है कि वह साल भर त्रिशूल बनाने का काम करते हैं. सबसे ज्यादा व्यापार शिवरात्रि के 15 से 20 दिन पहले होता है. छिंदवाड़ा में इसके लिए एक बाजार भी लगता है. लोग यहां से त्रिशूल खरीद कर चौरागढ़ की पहाड़ियों पर पहुंचते हैं और भगवान शिव को अर्पण करते हैं.

    भक्त सोनम अहिरवार ने बताया कि, ''चौरागढ़ महादेव धाम श्रद्धा का केंद्र है. हम मातृशक्ति भी वहां पर पहुंचकर त्रिशूल अर्पित करते हैं. छिंदवाड़ा में त्रिशूल दीक्षा का भी कार्यक्रम आयोजित किया जाता है, जिससे लोग ले जाकर त्रिशूल अर्पित करते हैं.''

    त्रिशूल के तीन कोणों का है अलग-अलग महत्व
    भागवताचार्य पंडित शिवकुमार शास्त्री ने बताया कि, ''भगवान शंकर का त्रिशूल सिर्फ शस्त्र नहीं, बल्कि इसके तीनों कोणों का अपना अलग-अलग महत्व है. सृष्टि के तीन प्रमुख पहलुओं सृजन, पालन और संहार, के साथ तीन गुणों सत, रज, तम और तीनों कालों भूत, वर्तमान, भविष्य पर शिव की महारत का प्रतीक है. जो बुराई का नाश कर धर्म और ज्ञान की स्थापना करता है और सृष्टि को संतुलित करने का संदेश देता है. भगवान शंकर के हाथ में त्रिशूल यह बताता है कि वह संपूर्ण है.''

    सतपुड़ा की पहाड़ियों में है चौरागढ़ महादेव
    पंडित शिवकुमार शास्त्री ने बताया कि, ''कहा जाता है कि जब भगवान शंकर ने भस्मासुर को आशीर्वाद दिया था कि वह जिसके भी सिर पर हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा. उसने शंकर भगवान पर ही इसका प्रयोग करने के लिए सोचा जिसेसे भगवान बचते बचते चौरागढ़ की पहली पायरी में पहुंचे थे. यहां पर भगवान विष्णु ने सुंदर कन्या का रूप लेकर उसे ही खुद के सिर पर हाथ रखने को मजबूर कर दिया था.

    इसके बाद फिर भगवान शंकर सतपुड़ा के पहाड़ों में जाकर तपस्या करने लगे थे. चौरागढ़ सतपुड़ा के पहाड़ों में शंकर भगवान का एक स्थान है. जहां पर लोग पहाड़ों के बीच से होकर गुजरते हैं और सात पहाड़ों को पार करने के बाद भगवान शंकर के दर्शन होते हैं. पचमढ़ी की तरफ से जाओ तो 1300 सीढ़ियां चढ़ना पड़ती हैं. शिवरात्रि के दौरान करीब 1 महीने यहां लगातार हजारों की संख्या में लोग दर्शन करने पहुंचते हैं.

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