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    Homeराजस्थानअलवरटहला क्षेत्र को आज भी प्रेरित कर रही हैं दादू वाणी

    टहला क्षेत्र को आज भी प्रेरित कर रही हैं दादू वाणी

    नरैना के 420वें दादू मेले के बीच घाटड़ा की तपोस्थली बनी आस्था का केंद्र

    डॉ. अभिमन्यु सिद्ध,

     जयपुर के नरैना में 22 से 27 फरवरी तक आयोजित 420वें छह दिवसीय दादू मेले के बीच दादू वाणी की भक्ति लहर पूरे प्रदेश में प्रवाहित हो रही है। इसी क्रम में अलवर जिले की टहला तहसील का घाटड़ा गांव भी दादू पंथ की आध्यात्मिक परंपरा से ओतप्रोत है। इस क्षेत्र की विशेषता यह है कि यहां संत दादू दयाल के प्रथम शिष्य माने जाने वाले बड़े सुंदरदास जी एवं उनके शिष्य प्रहलाद दास जी की तपोस्थली स्थित है।

    • 52 थांभों में सबसे बड़ा थांभा

    दादू दयाल जी के प्रमुख 52 शिष्यों की परंपरा को “52 थांभा” कहा जाता है। इनमें सबसे बड़ा थांभा बड़े सुंदरदास जी का माना जाता है, जिसे “महंत सुंदरदास जी बड़े का थांभा” के नाम से जाना जाता है। दादू पंथ की नागा परंपरा भी इसी थांभे से जुड़ी मानी जाती है।

    बताया जाता है कि इसी परंपरा के अंतर्गत सात जमातें, ग्यारह अखाड़े और विशाल संत समुदाय संचालित होता रहा है।

    भीमराज से बने सुंदरदास बड़े

    बड़े सुंदरदास जी का पूर्व नाम भीमराज था। उनका जन्म बीकानेर राजपरिवार में हुआ। सांसारिक जीवन और युद्ध कौशल में निपुण होने के बावजूद उनका झुकाव भक्ति की ओर था। जीवन की विषम परिस्थितियों के बाद उन्होंने वैराग्य धारण किया और अंततः सांभर में संत दादू दयाल से विक्रम संवत 1626 फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को गुरु दीक्षा प्राप्त की।     दीक्षा के पश्चात वे सुंदरदास बड़े के नाम से विख्यात हुए, जबकि प्रहलाद दास जी उनके एकमात्र शिष्य बने।

    घाटड़ा की तपोभूमि और वर्तमान परंपरा

    गुरु आज्ञा से दोनों संत अलवर जिले की टहला तहसील के घाटड़ा पहुंचे। यहां दूंदपुरी (तिलदह) और बड़े बाग क्षेत्र में उनकी तपस्थली स्थापित हुई। वर्तमान में भी “रामशाला” और “प्रह्लादशाला” इस परंपरा के साक्षी हैं।

    घाटड़ा को “सुंदरद्वारा” भी कहा जाता है और यह दादूपंथी नागा परिवार का प्रमुख पूज्य स्थल माना जाता है। यहां बसंत पंचमी को मेला आयोजित होता है। बताया जाता है कि इसी परंपरा में नागा पंथ की सशक्त संत सेना का गठन हुआ, जिसने ऐतिहासिक काल में अनेक युद्धों में भाग लिया।

    वर्तमान में “महंत बड़े सुंदरदास का थांभा” की तेरहवीं गद्दी परंपरा में महंत जयराम दास जी विराजमान हैं। प्रहलाद दास जी की समाधि एवं वाणी उपदेश भी इसी स्थल पर संरक्षित हैं।

    दादू वाणी की आज की प्रासंगिकता

    संत दादू की शिक्षाएं परब्रह्म को आदि गुरु मानने, हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल देने, जाति-पांति और कर्मकांड का विरोध करने तथा प्रेम को सर्वोच्च मानने पर आधारित थीं।

    आज भी टहला क्षेत्र में दादू वाणी की यही शिक्षाएं सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक चेतना का संदेश दे रही हैं।

    दादू वाणी का यह संदेश – प्रेम, समानता और एकता – आज के समय में भी समाज को दिशा देने वाला प्रकाश स्तंभ बना हुआ है।

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