अणुव्रत भवन में सत्य-असत्य के नैतिक पक्ष पर मंथन
राजेश रवि
चंडीगढ़। सेक्टर-24 सी स्थित अणुव्रत भवन के तुलसी सभागार में आयोजित सभा को संबोधित करते हुए मनीषी संत मुनिश्री विनयकुमारजी आलोक ने कहा कि झूठ की कोई सीमा नहीं होती, वह सच को छिपाने के लिए अनगिनत कहानियां गढ़ सकता है, लेकिन अंततः विश्वास को पूरी तरह तोड़ देता है।
उन्होंने कहा कि सच की अपनी मर्यादा होती है, जबकि झूठ बोलने वाला व्यक्ति अपनी गलतियों को छिपाने के लिए निरंतर असत्य का सहारा लेता रहता है और अंततः अपनी विश्वसनीयता खो देता है।
नैतिकता की कसौटी पर सत्य-असत्य
मुनिश्री ने कहा कि यदि किसी परिस्थिति में सच बोलने से अधिक नुकसान हो और झूठ से कम, तो उस स्थिति की नैतिकता पर विचार किया जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संवाद में सत्य की प्रासंगिकता और संभावित नुकसान का आकलन आवश्यक है।
उन्होंने कहा, “झूठ के पैर छोटे होते हैं। एक समय ऐसा आता है जब सत्य सामने आ जाता है और उससे केवल भावनात्मक ही नहीं, बल्कि सामाजिक व अन्य क्षेत्रों में भी हानि होती है।”
विकारों से मुक्ति ही सच्चाई का मार्ग
अपने प्रवचन के अंतिम चरण में मुनिश्री ने कहा कि सत्य स्वाभाविक और अक्षय है, जबकि झूठ अस्वाभाविक विकार है, जिसका पतन निश्चित है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि रावण ने अपार विद्वता अर्जित की, परंतु अंतर्मन के विकारों के कारण उसका पतन हुआ। जब मन में अहंकार, लोभ, मोह, क्रोध और काम जैसे दोष उत्पन्न होते हैं, तभी असत्य प्रभावी होता है।
मुनिश्री ने कहा कि अंतर्मन का सत्य ही परम चैतन्य शक्ति है, जो व्यक्ति को परिस्थितियों और व्यक्तियों को सही दृष्टि से समझने योग्य बनाता है।
सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने प्रवचन को आत्ममंथन और जीवन में सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाला बताया।
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