मानसिक और शारीरिक संतुलन बनाए रखना हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य
चंडीगढ़। सेक्टर-24 सी स्थित अणुव्रत भवन के तुलसी सभागार में आयोजित सभा को संबोधित करते हुए मनीषी संत मुनि विनयकुमार जी आलोक ने कहा कि संतुलन दुनिया के तमाम तत्वों, व्यक्तियों, स्थलों और परिस्थितियों के लिए नितांत आवश्यक है। संतुलन के बिना कोई भी तत्व अपने अस्तित्व और गुणवत्ता को लंबे समय तक बनाए नहीं रख सकता।
उन्होंने कहा कि सृष्टि के पंचतत्व, ग्रह-नक्षत्र, तारे और आकाशगंगाएं अपनी-अपनी धुरी पर संतुलित रूप से चलायमान रहती हैं, तभी सृष्टि का संचालन संभव है। इसी प्रकार मनुष्य के मन, मस्तिष्क और शरीर में संतुलन आवश्यक है। पुरुषार्थ चतुष्टय—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों के बीच भी आनुपातिक संतुलन बना रहना चाहिए।
मनीषी संत ने कहा कि जितना बैठकर कार्य करना जरूरी है, उतना ही चलना-फिरना भी आवश्यक है। जो लोग लंबे समय तक कुर्सियों या व्हीलचेयर पर बैठे रहते हैं, उनके लिए शारीरिक गतिविधि आवश्यक है। वहीं, जो लोग अधिक शारीरिक श्रम करते हैं, उनके लिए पर्याप्त विश्राम जरूरी है।
उन्होंने कहा कि सृष्टि का प्रत्येक तत्व जड़ और चेतन के चक्र से होकर गुजरता है। जो आज स्थिर है, वह कल गतिशील हो सकता है और जो आज गतिशील है, वह कल स्थिर हो सकता है। मनुष्य को अपने दिल-दिमाग और शरीर दोनों को सक्रिय रखना चाहिए। इनके संचालन में निरंतर संतुलन रहने पर ही व्यक्ति स्वस्थ और प्रसन्न रह सकता है।
अंत में उन्होंने कहा कि मानसिक और शारीरिक श्रम का संतुलित अनुपात आवश्यक है। किसी एक के अधिक होने पर संतुलन बिगड़ जाता है। अधिक मानसिक परिश्रम करने वालों को प्रकृति के सान्निध्य और शारीरिक विश्राम की आवश्यकता होती है, वहीं अधिक शारीरिक श्रम करने वालों को मानसिक विश्राम और आत्मसंतुष्टि की जरूरत होती है।
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