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    Homeधर्म-समाजरमजान के वो 10 दिन जो बदल सकते हैं तकदीर, जानें दूसरा...

    रमजान के वो 10 दिन जो बदल सकते हैं तकदीर, जानें दूसरा अशरा क्यों है सबसे खास?

    रमजान का पाक महीना इस्लाम में रहमत और बरकत का संदेश लेकर आता है, लेकिन ग्यारहवें रोजे से शुरू होने वाला दूसरा अशरा खास तौर पर मगफिरत यानी गुनाहों की माफी के लिए जाना जाता है. मान्यता है कि इन 10 दिनों में बंदा सच्चे दिल से तौबा करे तो अल्लाह उसकी दुआ कबूल फरमाता है. यही वजह है कि मस्जिदों में इबादत का जोश बढ़ जाता है, लोग ज्यादा से ज्यादा नमाज, तिलावत और दुआ में वक्त बिताते हैं.

    रमजान का पवित्र महीना इस्लाम में आत्मशुद्धि, सब्र और इबादत का महीना माना जाता है. पहले दस दिनों को रहमत का अशरा कहा जाता है. वहीं ग्यारहवें रोजे से शुरू होने वाला दूसरा अशरा मगफिरत यानी माफी का अशरा कहलाता है. यह दौर 11वें से 20वें रोजे तक चलता है और इसे गुनाहों से तौबा कर अल्लाह से माफी पाने का सबसे खास समय माना जाता है.
    सच्चे दिल से मांगी माफी होती है कबूल

    इस अशरे में अल्लाह अपने बंदों के लिए मगफिरत के दरवाजे खोल देता है. जो भी शख्स सच्चे दिल से अपने किए गए गुनाहों पर पछतावा करता है और तौबा करता है, उसकी दुआ कबूल होने की उम्मीद ज्यादा मानी जाती है. यही वजह है कि इन दिनों मस्जिदों में नमाजियों की संख्या बढ़ जाती है और लोग ज्यादा समय इबादत में बिताते हैं.

    माफी मांगने के लिए पढ़ी जाती है यह दुआ
    बाड़मेर शहर के आयशा मस्जिद इंद्रा कॉलेनी के हाजी मुनव्वर कादरी बताते हैं कि तौबा केवल जुबान से माफी मांगना नहीं है बल्कि दिल से पछताना और भविष्य में वही गलती दोबारा न करने का पक्का इरादा करना है. इस अशरे में पढ़ी जाने वाली मशहूर दुआ “अस्तग़फिरुल्लाह रब्बी मिन कुल्लि ज़ंबिं व अतूबु इलैह” इंसान को अपने गुनाहों की माफी मांगने और अल्लाह की ओर लौटने का संदेश देती है.
    जकात और सदका देकर करते हैं जरूरतमंद की मदद
    दूसरे अशरे में लोग पांच वक्त की नमाज के साथ-साथ नफ्ल नमाज, कुरआन की तिलावत, जिक्र और दुआ पर खास ध्यान देते हैं. जकात और सदका देकर जरूरतमंदों की मदद करना भी इस दौर में ज्यादा महत्व रखता है. समाज में भाईचारे, माफी और मेल-मिलाप की भावना को भी बढ़ावा मिलता है. बीसवें रोजे के बाद रमजान का तीसरा अशरा शुरू होता है, जिसे जहन्नम की आग से निजात का अशरा कहा जाता है. इन अंतिम दस दिनों में इबादत और भी बढ़ जाती है और शब-ए-कद्र की तलाश की जाती है.

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