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    छत्तीसगढ़ की पुरातत्त्वीय धरोहरों के संरक्षण को मिला नया संबल, तीन दिवसीय कार्यशाला का हुआ सफल समापन

    रायपुर : प्रदेश की समृद्ध पुरातत्त्वीय और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण, संवर्धन तथा उनके प्रति जनभागीदारी को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से “जिला पुरातत्त्वीय संघों के निर्माण एवं कार्यविधियां” विषय पर आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला का सोमवार को सफलतापूर्वक समापन हुआ। 07 से 09 मार्च तक आयोजित इस कार्यशाला में छत्तीसगढ़ के 21 जिलों से आए जिला पुरातत्त्व संघों के प्रतिनिधियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और पुरातत्त्वीय धरोहरों के संरक्षण से जुड़ी विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से जानकारी प्राप्त की।

    कार्यशाला के अंतिम दिन प्रतिभागियों को नव उत्खनित पुरास्थल रीवांगढ़ व पुरखौती मुक्तांगन संग्रहालय का परिभ्रमण कराया गया। इस दौरान विशेषज्ञों द्वारा उन्हें प्राचीन स्थलों की पहचान, उत्खनन की प्रक्रिया, प्राप्त पुरावशेषों के संरक्षण और उनके वैज्ञानिक प्रबंधन के संबंध में विस्तार से जानकारी दी गई। प्रतिभागियों ने इन स्थलों का अवलोकन कर प्रदेश की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत के महत्व को निकट से समझा।

    समापन अवसर पर पुरखौती मुक्तांगन संग्रहालय परिसर में आयोजित कार्यक्रम में विभिन्न जिलों से आए प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव साझा किए। प्रतिभागियों ने कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएँ पुरातत्त्वीय धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर जनसहभागिता सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसे प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम भविष्य में संभाग स्तर पर भी आयोजित किए जाने चाहिए, ताकि अधिक से अधिक लोग अपनी स्थानीय ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए प्रेरित हो सकें।

    संस्कृति विभाग के संचालक श्री विवेक आचार्य ने कहा कि यह कार्यशाला प्रदेश की पुरातत्त्वीय धरोहरों के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में अनेक ऐसे प्राचीन स्थल, स्मारक और पुरावशेष मौजूद हैं, जो राज्य के गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक परंपराओं के साक्षी हैं। इन धरोहरों की पहचान, संरक्षण और उनके महत्व के प्रति समाज को जागरूक करना अत्यंत आवश्यक है। जिला पुरातत्त्वीय संघों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर लोगों को जोड़कर इन धरोहरों की सुरक्षा और संरक्षण सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है।

    उन्होंने यह भी कहा कि जब स्थानीय समुदाय अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों के महत्व को समझता है, तब उनके संरक्षण का कार्य और अधिक प्रभावी हो जाता है। इसी उद्देश्य से इस कार्यशाला के माध्यम से जिला पुरातत्त्व संघों के प्रतिनिधियों को आवश्यक प्रशिक्षण और मार्गदर्शन प्रदान किया गया है, जिससे वे अपने-अपने क्षेत्रों में पुरातत्त्वीय स्थलों की पहचान और संरक्षण के कार्य में सक्रिय भूमिका निभा सकें।
    समापन कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित पद्मश्री डॉ. अजय मंडावी तथा आयोजन के प्रभारी डॉ. पीसी पारख ने प्रतिभागियों को सहभागिता प्रमाणपत्र प्रदान किए। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत अत्यंत समृद्ध है और इसके संरक्षण में समाज की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। इस प्रकार के आयोजन न केवल ज्ञानवर्धन करते हैं, बल्कि लोगों को अपनी धरोहरों के प्रति जिम्मेदारी का बोध भी कराते हैं।

    कार्यक्रम का संचालन पुरातत्त्ववेत्ता प्रभात कुमार सिंह द्वारा किया गया। इस अवसर पर डॉ. वृषोत्तम साहू, प्रवीन तिर्की, डॉ. राजीव मिंज, विष्णु नेताम, समीर टल्लू, मुकेश जोशी, अमर भरतद्वाज, नूतन एक्का तथा अरुण निर्मलकर सहित विभागीय अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित थे।
    तीन दिवसीय इस कार्यशाला के माध्यम से प्रतिभागियों को पुरातत्त्वीय धरोहरों के संरक्षण, प्रबंधन, उत्खनन कार्यों की प्रक्रिया, संग्रहालयों के संचालन तथा जनसहभागिता को बढ़ावा देने की कार्यप्रणाली के बारे में व्यावहारिक और उपयोगी जानकारी प्राप्त हुई। इससे न केवल प्रदेश में पुरातत्त्वीय धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर इनके संरक्षण और संवर्धन के लिए एक सशक्त जनआंदोलन को भी बढ़ावा मिलेगा।

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