किशनगढ़ बास में श्मशान विस्तार के लिए फिर शहरवासियों से जुटाया जा रहा चंदा
मुकेश सोनी , किशनगढ़ बास। डबल इंजन की सरकार में जहां हर घर तक विकास की बात की जा रही है, वहीं किशनगढ़ बास में एक ऐसी जगह भी है जहां विकास के लिए अब भी लोगों को चंदा जुटाना पड़ रहा है। यह जगह है शहर के बासड़ा रोड स्थित प्रमुख श्मशान घाट, जिसके विस्तार और सुविधाओं के लिए शहरवासियों को स्वयं आगे आना पड़ रहा है।
बताया जा रहा है कि करीब चार से पांच वर्ष पहले एक भामाशाह ने श्मशान घाट के विस्तार के लिए अपनी लाखों रुपए कीमत की जमीन निःशुल्क दान में दी थी। इस जमीन पर चारदीवारी और हाल निर्माण कर लकड़ियां रखने तथा अंतिम संस्कार में आने वाले लोगों के बैठने की व्यवस्था की जानी थी। लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी इस कार्य के लिए सरकारी मदद नहीं मिल सकी।
श्मशान घाट समिति के सदस्यों का कहना है कि उन्होंने कई बार सांसद, विधायक और नगर पालिका से इस कार्य के लिए बजट उपलब्ध कराने की मांग की, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिला। अब मजबूरी में समिति को शहरवासियों से चंदा एकत्र कर निर्माण कार्य कराने की पहल करनी पड़ रही है।
इसको लेकर शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या श्मशान घाट के विकास की जिम्मेदारी केवल आम लोगों की ही है। कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब जनप्रतिनिधियों के पास विकास के लिए सरकारी कोष उपलब्ध हैं तो श्मशान घाट जैसे आवश्यक स्थल के लिए राशि क्यों नहीं दी जा रही।
बताया गया कि इससे पहले भी श्मशान घाट के जीर्णोद्धार के लिए करीब 10 लाख रुपए से अधिक का चंदा एकत्र कर कार्य कराया जा चुका है। इस बार लकड़ियां रखने के लिए हाल निर्माण और बैठने की व्यवस्था के लिए करीब 15 से 20 लाख रुपए की आवश्यकता बताई जा रही है।
संयुक्त व्यापार महासंघ अध्यक्ष परमानंद लखयाणी ने बताया कि करीब पांच साल पहले जरूरत को देखते हुए श्मशान घाट की चारदीवारी से सटी पिछली ओर लगभग 1000 वर्ग फुट से अधिक जमीन निशुल्क कमेटी को दिलाई गई थी, ताकि वहां हाल का निर्माण किया जा सके।
वहीं निर्माण राशि कलेक्शन कमेटी के सदस्य हरमेश खुराना ने बताया कि दान में मिली जमीन पर हाल निर्माण और अन्य सुविधाओं के लिए 15 से 20 लाख रुपए की जरूरत है। उन्होंने कहा कि नगर पालिका चेयरमैन और भाजपा नेताओं से नगर पालिका तथा सांसद कोष से बजट दिलाने की मांग भी की गई थी। नगर पालिका द्वारा एस्टीमेट भी तैयार किया गया, लेकिन अब तक बजट स्वीकृत नहीं हो पाया।
समिति के सदस्यों का कहना है कि जब बार-बार केवल आश्वासन ही मिल रहा है तो मजबूरी में शहरवासियों से चंदा एकत्र कर निर्माण कार्य करवाने का प्रयास किया जा रहा है।
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