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    अरावली संरक्षण शिक्षा अभियान प्रशिक्षण शिविर संपन्न, विद्यार्थियों ने किया फील्ड अध्ययन

    अरवरी नदी पुनर्जीवन मॉडल का अध्ययन, जल-संरक्षण व भू-सांस्कृतिक समझ से मिला शिक्षण अनुभव

    अलवर। तरुण आश्रम भीकमपुरा में 8 मार्च से प्रारंभ हुआ सात दिवसीय अरावली संरक्षण शिक्षा अभियान प्रशिक्षण शिविर 14 मार्च 2026 को सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस प्रशिक्षण शिविर में देश के विभिन्न शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों, शिक्षकों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने भाग लिया तथा अरावली पर्वतमाला एवं अरवरी नदी के पुनर्जीवन से जुड़े सामुदायिक प्रयासों का गहन अध्ययन किया। अभियान का उद्देश्य जल-संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और स्थानीय भू-सांस्कृतिक विविधता के प्रति जागरूकता बढ़ाना रहा।

    शिविर के दौरान प्रतिभागियों ने अरवरी नदी के उद्गम क्षेत्र से लेकर संगम तक अनेक गांवों का भ्रमण किया। अध्ययन यात्रा में भांवता, कोल्याला, जूमोली, हमीरपुर, देव का देवरा, कालेड़, जैतपुर गुर्जरां और सैंथल सागर क्षेत्र सहित विभिन्न स्थानों पर जल संरचनाओं, जोहड़ों और बांधों का निरीक्षण किया गया। ग्रामीणों से संवाद कर यह समझने का प्रयास किया गया कि सामुदायिक सहयोग, परंपरागत ज्ञान और सतत जल-संरक्षण प्रयासों ने किस प्रकार एक समय सूख चुकी अरवरी नदी को पुनर्जीवित किया।

    तरुण भारत संघ द्वारा वर्ष 1985 से प्रारंभ किए गए जल-संरक्षण कार्यों का सकारात्मक परिणाम वर्ष 1995 में सामने आया, जब अरवरी नदी पहली बार पूरे वर्ष बहने लगी। खनन से प्रभावित इस क्षेत्र में जोहड़ों, एनिकट और अन्य जल संरचनाओं के निर्माण से भूजल स्तर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई तथा खेती, पशुपालन और वन संपदा में सुधार देखने को मिला। स्थानीय समुदायों के संगठित प्रयासों से खनन गतिविधियों पर नियंत्रण स्थापित हुआ और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में नई पहल शुरू हुई।

    अनंत विश्वविद्यालय, अहमदाबाद के विद्यार्थियों ने इस अध्ययन शिविर में सक्रिय भागीदारी निभाई। प्रोफेसर अनुनय चौबे, प्रोफेसर पुनीत कुमार और प्रोफेसर स्वाति मंगरूलकर के मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने डिजाइन थिंकिंग, जलवायु परिवर्तन और सामुदायिक सहभागिता आधारित समाधान की अवधारणाओं को व्यवहारिक रूप से समझा। विद्यार्थियों ने फील्डवर्क के दौरान वीडियोग्राफी, फोटोग्राफी, ग्रामीण साक्षात्कार और भू-सांस्कृतिक मानचित्रण के माध्यम से जल, वन, कृषि, जीव-जंतु, आजीविका और सामाजिक संरचना से जुड़े पहलुओं का विश्लेषण किया।

    शिविर में प्रतिभागियों ने खजूरी बांध, भोजकला एनिकट, नाहर नाला और सैंथल सागर जैसी जल संरचनाओं का निरीक्षण कर पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणाली की प्रभावशीलता को समझा। ग्रामीणों ने बताया कि जल-संरक्षण प्रयासों के कारण क्षेत्र में सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है और अब शिक्षा तथा रोजगार के नए अवसर विकसित हो रहे हैं। कई गांवों में जल उपलब्धता बढ़ने से खेती का रकबा बढ़ा है तथा पशुपालन को भी सहारा मिला है।

    समापन समारोह में वरिष्ठ पर्यावरणविद् डॉ. राजेंद्र सिंह ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि अरावली पर्वतमाला और अरवरी नदी के बीच गहरा पारिस्थितिक संबंध है। उन्होंने बताया कि यदि पर्वतीय पारिस्थितिकी, वन संपदा और जल स्रोत सुरक्षित रहेंगे, तभी नदी का सतत प्रवाह और उससे जुड़ा सामाजिक-आर्थिक जीवन भी सुरक्षित रह सकेगा। उन्होंने सामुदायिक जल प्रबंधन मॉडल को देश के अन्य क्षेत्रों के लिए प्रेरणादायक बताया।

    शिविर के अंत में प्रतिभागियों को राजस्थानी परंपरा के अनुसार साफा और ओढ़नी पहनाकर सम्मानित किया गया। सात दिवसीय इस अभियान ने विद्यार्थियों को प्रकृति, समाज और संस्कृति के अंतर्संबंधों को प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर प्रदान किया। अध्ययन रिपोर्ट और फील्डवर्क के निष्कर्षों से स्पष्ट हुआ कि अरवरी नदी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि सामुदायिक सहयोग और सतत विकास का सशक्त उदाहरण है।

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