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    ईरान युद्ध से फूड डिलीवरी, कॉस्मेटिक्स और कपड़ा उद्योग सेक्टर भी हो सकता है प्रभावित

    नई दिल्ली। वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब शेयर बाजारों पर भी देखने लगा है। ईरान से जुड़े युद्ध की आशंका और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने निवेशकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। पहले जहां चिंता केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित मानी जा रही थी, वहीं अब इसके प्रभाव का दायरा बढ़ रहा है। फूड डिलीवरी कंपनियों से लेकर कॉस्मेटिक्स और कपड़ा उद्योग तक कई सेक्टर संभावित सप्लाई बाधाओं और बढ़ती लागत के दबाव में आ सकते हैं।
    दरअसल, युद्ध शुरू होने के बाद से वैश्विक शेयर बाजारों में करीब 5.5 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट 2022 के बाद किसी एक महीने में सबसे बड़ी मानी जा रही है। एशियाई बाजारों पर इसका असर सबसे ज्यादा देखा गया है। निवेशकों को डर है कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई फिर से बढ़ सकती है और युद्ध पर होने वाला खर्च कई देशों के बजट घाटे को भी बढ़ा सकता है। बाजार में बढ़ती अनिश्चितता से ट्रेडर्स ने अब अमेरिका के केंद्रीय बैंक यानी फ्रेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद को भी आगे खिसका दिया है। अब अनुमान लगाया जा रहा है कि अगली बड़ी दर कटौती संभवतः 2027 के बीच तक ही हो पाएगी। इस बदलाव ने भी वैश्विक निवेशकों की रणनीति को प्रभावित किया है।
    युद्ध के कारण सबसे पहले असर एयरलाइंस और शिपिंग कंपनियों पर पड़ा है। तेल की कीमतें बढ़ने से विमानन कंपनियों की ईंधन लागत बढ़ जाती है, जिससे उनके मुनाफे पर दबाव आता है। इसी तरह समुद्री परिवहन कंपनियों के लिए भी ऑपरेशन महंगे हो जाते हैं और व्यापारिक मार्गों में जोखिम बढ़ जाता है। इसके विपरीत रक्षा और ऊर्जा कंपनियों के शेयरों में तेजी देखी जा रही है। युद्ध और तनाव के दौर में रक्षा उपकरणों की मांग बढ़ने की संभावना रहती है, जिससे रक्षा कंपनियों के शेयरों को फायदा मिलता है। वहीं तेल और गैस कंपनियां भी ऊंची कीमतों का लाभ उठा सकती हैं।
    स्थिति तब और गंभीर हो गई जब अमेरिका ने उस खर्ग द्वीप पर बड़ा हमला किया, जहां से ईरान के कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा निर्यात होता है। इस घटना के बाद मध्य पूर्व क्षेत्र में ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ गई है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो वैश्विक तेल और गैस बाजार में आपूर्ति और मांग के बीच असंतुलन पैदा हो सकता है। इसी वजह से निवेशकों की नजर अब उन सेक्टरों पर भी जा रही है जिन्हें पहले इस संकट से ज्यादा प्रभावित नहीं माना जा रहा था। सेमीकंडक्टर कंपनियां और कपड़ा उद्योग भी जोखिम में आ सकते हैं। हीलियम जैसी गैसों की कमी से चिप निर्माण प्रभावित हो सकता है, जबकि कच्चे माल की कीमत बढ़ने से कपड़ा कंपनियों की लागत बढ़ सकती है।

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