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पंचायती राज : लोक भागीदारी के बिना कुछ नहीं होगा
जलपुरुष राजेन्द्र सिंह
पंचायती राज दिवस मनाने से भारत का पंचायती राज मजबूत नहीं होगा। यदि इसे सशक्त बनाना है, तो संविधान के 73वें और 74वें संशोधन को वास्तविक रूप में लागू और मजबूत करना होगा। आज पंचायती राज का अर्थ विकेन्द्रित लोकतंत्र है, लेकिन औद्योगिक संचालित वर्तमान व्यवस्था इस विकेन्द्रित शक्ति को मजबूत होते देखना नहीं चाहती।
इन संशोधनों में क्रांतिकारी क्षमता है, परंतु क्रांतिकारिता सत्ता संरचनाओं को अक्सर स्वीकार्य नहीं होती। दिखावे के स्तर पर कुछ प्रयास होते रहे हैं, पर वे पंचायती राज को वास्तविक मजबूती देने में सक्षम नहीं हैं।
गांव: लोकतंत्र की मूल इकाई
पंचायती राज को मजबूत करने के लिए गांव, ढाणी और टोले को एक स्वतंत्र और सक्षम इकाई के रूप में स्थापित करना आवश्यक है। इनके संसाधनों की लूट रुके और इनकी स्वायत्तता बनी रहे—यही सच्चे विकेन्द्रीकरण का आधार है।
भारत की लोकनीति में गांवों की शक्ति को समझना और सम्मान देना जरूरी है। आज औद्योगिक शक्तियाँ गांवों को कमजोर कर रही हैं, लेकिन जिस दिन गांव अपनी रक्षा करने में सक्षम हो जाएंगे, उस दिन भारत का विकेन्द्रित लोकतंत्र विश्व के लिए उदाहरण बन सकता है।
सत्ता, चुनाव और पंचायती राज
वर्तमान व्यवस्था में पंचायतें सरकारों के लिए आर्थिक लाभ का स्रोत नहीं मानी जातीं, बल्कि खर्च का कारण समझी जाती हैं। इसलिए सरकारें उन शक्तियों को प्राथमिकता देती हैं, जो चुनावों में सहायता करती हैं।
परिणामस्वरूप, राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र बड़े उद्योगों और प्रभावशाली वर्गों के साथ खड़ा हो जाता है, जिससे पंचायती राज कमजोर पड़ता है।
औद्योगिक राज बनाम ग्राम स्वराज
आज पंचायती राज के नाम पर कहीं न कहीं औद्योगिक राज का प्रभाव दिखाई देता है। फिर भी यह विश्वास बना हुआ है कि भारत सनातन विकास के मार्ग पर लौट सकता है।
यह मार्ग गांवों, नदियों, पहाड़ों और जंगलों से होकर जाता है। इसलिए संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों को पुनः पहचानने और उनके प्रति दायित्व निभाने की आवश्यकता है।
73वां और 74वां संशोधन: आधार स्तंभ
वर्ष 1992 में हुए 73वें और 74वें संविधान संशोधनों ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया। 2010 से राष्ट्रीय पंचायत राज दिवस मनाया जाने लगा।
इनका उद्देश्य विकेंद्रीकरण, सशक्तिकरण और स्थानीय स्वशासन को बढ़ावा देना था, लेकिन वास्तविक क्रियान्वयन अभी भी अधूरा है।
‘तीन एफ’ की चुनौती
स्थानीय संस्थाओं के सामने सबसे बड़ी समस्या ‘तीन एफ’—
फंड (निधि), फंक्शन (कार्य) और फंक्शनरी (कार्मिक)—का अधूरा हस्तांतरण है।
जिम्मेदारियां तो दी गई हैं, लेकिन संसाधनों और कर्मचारियों पर नियंत्रण अभी भी राज्य स्तर पर है, जिससे स्थानीय शासन कमजोर होता है।
विभागीय बिखराव और समन्वय का अभाव
जल, पर्यावरण, स्वच्छता, पंचायत और शहरी विकास जैसे विषय अलग-अलग विभागों में बंटे होने के कारण समग्र योजना का अभाव है।
नदी संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन जैसे विषयों के लिए एकीकृत दृष्टिकोण आवश्यक है, जो वर्तमान व्यवस्था में बाधित होता है।
वित्त आयोग और सतत विकास का अवसर
2026 से शुरू हो रहा 16वां वित्त आयोग स्थानीय संस्थाओं के लिए एक बड़ा अवसर है। इसके साथ ही सतत विकास लक्ष्यों की समयसीमा भी निकट है।
जरूरी है कि ग्राम पंचायत विकास योजनाओं को इन लक्ष्यों से जोड़ा जाए और आर्थिक नियोजन में पर्यावरणीय संतुलन को शामिल किया जाए।
पर्यावरण और स्थानीय शासन
ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायतें प्राकृतिक संसाधनों की रीढ़ हैं। पानी, भोजन और जैव विविधता का आधार गांव ही हैं।
अंधाधुंध शहरीकरण और विकास के नाम पर पारंपरिक प्रणालियों का नाश हो रहा है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है।
जल संकट और बदलती चुनौतियां
ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट गहराता जा रहा है। जहां पहले कुछ महीनों की कमी होती थी, अब यह अवधि बढ़ गई है।
शहरी क्षेत्रों में जल आपूर्ति, सीवेज और कचरा प्रबंधन गंभीर समस्याएं बन चुकी हैं। नदियों की स्थिति चिंताजनक है और नई पीढ़ी अपने प्राकृतिक संसाधनों से अनभिज्ञ होती जा रही है।
जैव विविधता और स्थानीय भागीदारी
जैव विविधता तेजी से समाप्त हो रही है। इसे बचाने के लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी आवश्यक है।
मनरेगा जैसी योजनाओं के माध्यम से संरक्षण को रोजगार से जोड़ा जा सकता है। पर्यावरणविद माधव गाडगिल के विचार भी इसी दिशा में मार्गदर्शक हैं।
आने वाला दशक: एक निर्णायक अवसर
वित्त आयोग, संवैधानिक अधिकार और सतत विकास लक्ष्य—इन सभी का संगम भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है।
यदि इस समय स्थानीय स्वशासन को सशक्त किया गया, तो यह एक मजबूत और टिकाऊ विकास मॉडल स्थापित कर सकता है।
लोक भागीदारी ही कुंजी
विकेन्द्रित लोकतंत्र की सफलता का केंद्र लोक भागीदारी है। जब तक समाज अपने संसाधनों और विकास की जिम्मेदारी स्वयं नहीं लेगा, तब तक समावेशी विकास संभव नहीं है।
भारत का संविधान समता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। इन्हें साकार करने के लिए पंचायती राज संस्थाओं को अपनी भूमिका पूरी निष्ठा से निभानी होगी—तभी एक सशक्त, न्यायपूर्ण और टिकाऊ लोकतंत्र की स्थापना संभव होगी।
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