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    समुद्र का ‘बुखार’ और भारत में दुष्काल की आशंका

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    समुद्र का ‘बुखार’ और भारत में दुष्काल की आशंका

    जलपुरुष राजेंद्र सिंह 

    वर्ष 2026 में गर्म हवाओं के बीच समुद्र का तापक्रम लगातार बढ़ रहा है। यह बढ़ता तापमान समुद्र को कंपनमय बनाता है, जो आगे चलकर उफान, तूफान और प्रलयकारी स्थितियों में बदल सकता है। समुद्र के भीतर और तटीय क्षेत्रों में यह उथल-पुथल कभी दुष्काल (सूखा) तो कभी बाढ़ के रूप में सामने आती है।

    सुखाड़, अनियमित वर्षा या कम वर्षा जैसी परिस्थितियों को मौसम विज्ञान में ‘एल नीनो’ कहा जाता है। इसके विपरीत, जब अतिवृष्टि और बाढ़ की स्थिति बनती है, तो उसे ‘ला नीना’ कहा जाता है। समुद्र का बढ़ता तापमान इन दोनों ही स्थितियों को प्रभावित करता है।

    जब समुद्री सतह अत्यधिक गर्म होती है, तो पानी का अतिवाष्पीकरण होता है। यह नमी ठंडे क्षेत्रों की ओर जाकर भारी वर्षा का कारण बनती है, जो बाढ़ के रूप में प्रकट होती है—इसे ‘ला नीना’ कहा जाता है। वहीं, जिन क्षेत्रों से यह नमी उठती है, वहां वर्षा की कमी हो जाती है, जो ‘एल नीनो’ की स्थिति उत्पन्न करती है।

    चालू वर्ष में समुद्र के इस ‘बुखार’ का प्रभाव भारत पर, विशेष रूप से महाराष्ट्र जैसे राज्यों में दुष्काल के रूप में दिखाई दे सकता है। यह स्थिति बंगाल के ऐतिहासिक दुष्काल की याद भी दिला सकती है। हालांकि, इसका स्पष्ट प्रभाव जून तक ही सामने आएगा, अभी यह पूर्वानुमान मात्र है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, इस बार बंगाल की खाड़ी की तुलना में पश्चिमी समुद्र (अरब सागर) पर अधिक दुष्प्रभाव देखने को मिल सकता है। जब समुद्री गर्म हवाएं नीचे की ओर आती हैं, तब उनका असर समुद्र की सतह पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

    एल नीनो और ला नीना: एक वैश्विक चक्र

    एल नीनो और ला नीना, प्रशांत महासागर में बनने वाले दो विपरीत जलवायु पैटर्न हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘एल नीनो-दक्षिणी दोलन चक्र’ कहा जाता है।

    • एल नीनो (गर्म चरण): पूर्वी प्रशांत महासागर में तापमान बढ़ाता है।
    • ला नीना (ठंडा चरण): समुद्री तापमान को सामान्य से कम कर देता है।

    व्यापारिक हवाओं के कमजोर होने पर गर्म पानी पश्चिम से पूर्व की ओर, दक्षिण अमेरिका की दिशा में बढ़ता है। इसके कारण दक्षिण अमेरिका और पेरू में अधिक वर्षा होती है, जबकि इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया में सूखे की स्थिति बनती है।

    अब एल नीनो की आवृत्ति लगभग 4–7 वर्षों के बीच देखी जा रही है और इसका प्रभाव 9–12 महीनों तक रह सकता है।

    ला नीना का प्रभाव

    ला नीना की स्थिति में तेज व्यापारिक हवाएं ठंडे पानी को ऊपर लाती हैं, जिससे वैश्विक तापमान में कमी आती है।

    • इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया में अधिक वर्षा
    • दक्षिण अमेरिका में सूखा
    • भारत में सामान्यतः मजबूत मानसून

    यह स्थिति 1 से 3 वर्षों तक बनी रह सकती है।

    भारत पर प्रभाव और चिंता

    भारत में ला नीना आमतौर पर अच्छी बारिश और बेहतर कृषि उत्पादन का संकेत देती है, जबकि एल नीनो सूखा और उत्पादन में कमी ला सकता है। वर्ष 2022-23 में एल नीनो के कारण भारत में लगभग 7% अन्न उत्पादन घटा था, जिससे कृषि और दुग्ध उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।

    वर्ष 2026 को ‘सुपर एल नीनो’ का वर्ष माना जा रहा है, जो देश के लिए गंभीर चिंता का विषय है। यदि अन्न उत्पादन में कमी आती है, तो इसका असर केवल भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर जीवन पर पड़ सकता है।

    समुद्री परतें और गहराई का प्रभाव

    समुद्र की कई परतें होती हैं। वैज्ञानिक अनुमान बताते हैं कि इस वर्ष तापमान का प्रभाव समुद्र की गहराई तक पहुंच रहा है। जब यह प्रभाव गहराई में जाता है, तो आसपास के क्षेत्रों में सूखे की स्थिति बनती है। वहीं, सतह पर इसका असर बाढ़ और तूफान के रूप में दिखाई देता है।

    समाधान और भविष्य की दिशा

    एल नीनो और ला नीना दोनों ही जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होते हैं, और जलवायु परिवर्तन उनकी आवृत्ति को भी बढ़ा रहा है। ऐसे में जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation) ही इन प्रभावों को कम करने का प्रमुख उपाय है।

    अरावली, सह्याद्रि और विंध्याचल क्षेत्रों में किए गए जल-संरक्षण और पर्यावरणीय प्रयास इसके सफल उदाहरण हैं। इनसे सीख लेकर प्राकृतिक पुनर्जनन और पारंपरिक ज्ञान को अपनाना ही दीर्घकालिक समाधान हो सकता है।

    अंततः, यह स्पष्ट है कि प्राकृतिक आपदाओं का स्थायी समाधान ‘प्राकृतिक भाव बुद्धिमत्ता’ में ही निहित है। कृत्रिम उपाय सीमित हैं, जबकि प्रकृति के साथ संतुलन ही जीवन को सुरक्षित और स्थायी बना सकता है।

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