मुंबई। महाराष्ट्र के सियासी गलियारों में इन दिनों 'ऑपरेशन टाइगर' को लेकर कयासों का बाजार बेहद गर्म है। इन तमाम चर्चाओं के बीच शिवसेना नेता संजय निरुपम ने उद्धव ठाकरे गुट (यूबीटी) पर तीखा हमला बोलते हुए दावा किया है कि यह संगठन अब पूरी तरह बिखर रहा है और इसके भीतर नेताओं का असंतोष चरम पर पहुंच चुका है। उन्होंने विरोधियों द्वारा लगाए जा रहे 'ऑपरेशन टाइगर' जैसे किसी भी गुप्त अभियान के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। निरुपम ने तंज कसते हुए कहा कि इस शब्दावली का आविष्कार पूरी तरह मीडिया ने किया है और सत्तापक्ष का इससे कोई सरोकार नहीं है। उन्होंने कहा कि वास्तविकता यह है कि उबाठा (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) नामक पार्टी का अस्तित्व अब धीरे-धीरे समाप्ति की ओर है और उनके खुद के विधायकों व सांसदों का अपनी शीर्ष लीडरशिप से भरोसा पूरी तरह उठ चुका है।
संजय निरुपम ने एक बड़ा दावा करते हुए कहा कि आगामी वर्ष 2029 तक यह पार्टी पूरी तरह इतिहास का हिस्सा बन जाएगी क्योंकि उद्धव ठाकरे के कमजोर नेतृत्व के कारण हर दिन लोग संगठन का साथ छोड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनके जनप्रतिनिधि पार्टी में रहेंगे या जाएंगे, यह पूरी तरह उनका अंदरूनी मामला है, लेकिन इतना तय है कि इस डूबते जहाज से लोग एक-एक कर बाहर निकल जाएंगे।
मातोश्री की आपात बैठक और सांसदों की 'ऑनलाइन' दूरी
शिवसेना नेता ने हाल ही में हुई एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि पिछले दिनों मुंबई स्थित ठाकरे परिवार के आवास 'मातोश्री' में पार्टी सांसदों की एक अति-महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई थी। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि उद्धव ठाकरे खुद तो हमेशा फेसबुक लाइव के जरिए राजनीति करते आए हैं, लेकिन इस बार उनके सांसदों ने उनसे ही प्रेरणा ले ली। बैठक में व्यक्तिगत रूप से पहुंचने के बजाय उनके कई सांसद ऑनलाइन लाइव (वर्चुअली) जुड़ गए और मातोश्री जाने से परहेज किया। निरुपम के अनुसार, सांसदों और विधायकों के भीतर व्याप्त यह भारी असंतोष साफ इशारा करता है कि आने वाले दिनों में ये सभी नेता धीरे-धीरे पार्टी को अलविदा कह देंगे।
अहंकार और सुलभ न होना बना बगावत की वजह
उबाठा गुट में पनप रहे इस आंतरिक विद्रोह के पीछे संजय निरुपम ने तीन प्रमुख कारण गिनाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पहला कारण तो यह है कि ठाकरे गुट के शीर्ष नेतृत्व के भीतर अत्यधिक अहंकार भरा हुआ है। दूसरा कारण, यह लीडरशिप अपने ही विधायकों और सांसदों के लिए आसानी से उपलब्ध (सुलभ) नहीं होती है, जिससे संवादहीनता की स्थिति बनी हुई है। तीसरी और सबसे बड़ी कमी यह है कि इस गुट के दोनों मुख्य मार्गदर्शक, यानी पिता (उद्धव ठाकरे) और पुत्र (आदित्य ठाकरे), अपने घर की सुख-सुविधाओं से बाहर निकलकर महाराष्ट्र के जमीनी दौरों पर जाने और कार्यकर्ताओं से मिलने की जहमत नहीं उठाते हैं।
बैठक से पांच सांसदों के गायब होने से मची खलबली
इस पूरे राजनैतिक विवाद का मुख्य कारण रविवार (14 जून) को मातोश्री में आयोजित सांसदों की वह आपात बैठक है, जिसमें कुल 9 सांसदों को आमंत्रित किया गया था, परंतु उनमें से 5 महत्वपूर्ण चेहरे नदारद रहे। इस अनुपस्थिति के बाद से ही सियासी हलकों में एक बार फिर बड़ी बगावत के सुर तेज हो गए हैं। ऐसी प्रबल चर्चाएं हैं कि उद्धव गुट के कई सांसद मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के निरंतर संपर्क में हैं और जल्द ही आधिकारिक तौर पर शिंदे खेमे का दामन थाम सकते हैं। हालांकि, डैमेज कंट्रोल में जुटे ठाकरे गुट के वरिष्ठ नेता अरविंद सावंत का कहना है कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है और जो सांसद बैठक में नहीं आ सके, वे कुछ व्यक्तिगत आपातकालीन कारणों की वजह से वर्चुअली इस चर्चा का हिस्सा बने थे।


