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    Homeराजस्थानअलवर"पापा, मुझे कुत्ते से डर लगता है!"

    “पापा, मुझे कुत्ते से डर लगता है!”


    🐾 “पापा, मुझे कुत्ते से डर लगता है!” — मासूम आरु की पुकार और एक पिता की चिंता

    ✍️ प्रो. रमेश बैरवा, एक कुत्ता-पीड़ित चिंतित नागरिक

    “एक नन्हीं सी गुड़िया बोली —
    पापा, मुझे कुत्ते से डर लगता है…”

    यह केवल एक मासूम बच्ची का वाक्य नहीं है, बल्कि एक ऐसे डर की गूंज है, जो आज शहरी समाज की एक बड़ी सच्चाई बन गया है।

    यह हमारी प्यारी आरु है — अनुज की तीन साल की बिटिया। कभी अपने आप बड़ी बहन यज्ञा के साथ पार्क में फिसलपट्टी और झूले का आनंद लेने वाली आरु अब पार्क का नाम सुनते ही सहम जाती है। वजह? कुत्ते का काट लेना।

    कुछ दिन पहले आरु और उसकी मां को कुत्ते ने काट लिया। तब से आरु न केवल मानसिक रूप से डरी हुई है, बल्कि उसे इंजेक्शन और अस्पताल के चक्कर भी झेलने पड़ रहे हैं। एसएमएस जयपुर तक इलाज करवाना पड़ा है।

    कल जब उसके पापा ने कहा — “चलो पार्क चलते हैं”, तो मासूम ने कहा:

    “बड़ी मम्मी आप चलो… कुत्ते आपको जानते हैं!”

    🏡 बुद्ध विहार सी-ब्लॉक की हकीकत

    सी ब्लॉक बुद्ध विहार जैसी रिहायशी कॉलोनियों में कुत्तों की बढ़ती संख्या अब न केवल असुविधा, बल्कि खतरे का कारण बन चुकी है।
    घर के दोनों ओर, गलियों में, पार्क के पास — कुत्ते अपनी ‘पोजिशन’ में रहते हैं। स्कूटी पर झपट्टा मारना, बच्चों का पीछा करना, कभी-कभी गाड़ियों तक पर हमला करना आम बात है। एक पागल कुत्ते का हमला तो सीधे अस्पताल पहुंचा सकता है।

    बुज़ुर्गों से लेकर बच्चों तक सभी डरे हुए हैं।
    हम रात में निकलना छोड़ चुके हैं।
    बच्चों की हँसी अब खिड़कियों के भीतर बंद हो चुकी है।

    🎓 कॉलेज और कक्षा में कुत्ते!

    मैं स्वयं एक शैक्षणिक संस्थान से जुड़ा हूं।
    अलवर के कला कॉलेज में मुझे भी कुत्ते ने काटा।
    आज शिक्षण परिसर तक कुत्तों से सुरक्षित नहीं रहे। क्लासरूम में छात्र भले ही कम मिलें, पर कुत्ते अक्सर मौजूद रहते हैं। कुछ प्रोफेसरों की प्रायोरिटी छात्रों को पढ़ाने से अधिक कुत्तों को खाना खिलाने में है। यह कैसा संतुलन है?

    📢 यह सिर्फ हमारी कॉलोनी की बात नहीं

    शहरभर में कुत्ते काटने की घटनाएं आम हैं। छोटे बच्चों पर जानलेवा हमले, वृद्धों को दौड़ाना, राहगीरों को गिरा देना — अब यह खबरें नहीं रहीं, आदत बन गई हैं। मीडिया भी इसे समय-समय पर उठाता रहा है, लेकिन समाधान अब तक नदारद है।


    अब प्रश्न यह है…

    • क्या इंसान के जीने, खेलने और सुरक्षित घूमने का अधिकार खत्म हो रहा है?

    • क्या शहरी पार्क, गली, स्कूल-कॉलेज अब बच्चों के लिए नहीं, कुत्तों के लिए हैं?

    • क्या प्रशासन की जिम्मेदारी केवल पशु प्रेम दिखाना है, या नागरिकों की सुरक्षा भी?

    हम समझते हैं — पशु प्रेम आवश्यक है।
    कुत्तों के साथ दया का व्यवहार भी जरूरी है।
    लेकिन उससे पहले — इंसान का जीवन, बच्चे की सुरक्षा और बुजुर्ग की शांति अधिक प्राथमिक होनी चाहिए।


    समाधान क्या हो सकता है?

    • नसबंदी और टीकाकरण की योजनाओं को सख्ती से लागू किया जाए।

    • रिहायशी क्षेत्रों में आवारा कुत्तों को शेल्टर होम में शिफ्ट किया जाए।

    • शहरी पार्कों, स्कूलों और सार्वजनिक स्थलों पर कुत्ते मुक्त क्षेत्र घोषित हों।

    • पशु प्रेमियों को भी जवाबदेह बनाया जाए — केवल खाना खिलाने से नहीं, सुरक्षा सुनिश्चित करने से भी।


    🙏 यह एक अपील है — एक डरी हुई मासूम आरु की ओर से, उसके पापा की ओर से, और हर उस नागरिक की ओर से जो केवल सुरक्षित जीवन चाहता है।

    क्या हम इस संतुलन को बनाने का साहस करेंगे?

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