More
    Homeराजस्थानजयपुरहाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, आरोपी का सोशल मीडिया ट्रायल असंवैधानिक

    हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, आरोपी का सोशल मीडिया ट्रायल असंवैधानिक

    जोधपुर। राजस्थान उच्च न्यायालय ने पुलिस द्वारा आरोपियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने और सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें व वीडियो साझा करने की परिपाटी पर कड़ा प्रहार किया है। अदालत ने साफ लफ्जों में चेतावनी दी है कि किसी भी व्यक्ति को सजा सुनाने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है; पुलिस को किसी आरोपी का 'सोशल मीडिया ट्रायल' करने या उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाने की अनुमति कतई नहीं दी जा सकती।

    "पुलिस जांच एजेंसी है, अदालत नहीं"

    हाईकोर्ट की एकल पीठ के न्यायाधीश जस्टिस फरजंद अली ने इस्लाम खान एवं अन्य की याचिकाओं पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को सम्मान और निजता के साथ जीने का मौलिक अधिकार देता है। गिरफ्तारी मात्र से ये अधिकार खत्म नहीं हो जाते। अदालत ने जालौर और जैसलमेर जैसे क्षेत्रों में पुलिस द्वारा आरोपियों को अपमानजनक स्थिति में बैठाकर फोटो वायरल करने की घटनाओं को 'डिजिटल शर्मिंदगी' और अवैध दंड करार दिया।


    अदालत की सख्त टिप्पणियाँ:

    • मौलिक अधिकारों का हनन: पुलिस द्वारा आरोपी को अपराधी की तरह पेश करना संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन है।

    • मीडिया ट्रायल पर चिंता: प्रेस कॉन्फ्रेंस या सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए आरोपी के खिलाफ पहले से ही पूर्वाग्रह पैदा करना निष्पक्ष न्याय प्रणाली में हस्तक्षेप है।

    • मानसिक आघात: सार्वजनिक प्रदर्शन से व्यक्ति के आत्मसम्मान और सामाजिक जीवन पर ऐसा घाव लगता है जो कभी नहीं भरता।


    अब लागू होगी नई गाइडलाइन (SOP)

    सुनवाई के दौरान राजस्थान पुलिस मुख्यालय और जोधपुर पुलिस कमिश्नरेट की ओर से अदालत में नई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) पेश की गई। इसके तहत अब:

    1. गिरफ्तार व्यक्तियों की फोटो या वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड करना प्रतिबंधित होगा।

    2. किसी भी आरोपी को मीडिया के सामने अपमानजनक तरीके से पेश नहीं किया जाएगा।

    3. सभी पुलिस अधिकारियों को इन निर्देशों का सख्ती से पालन करना अनिवार्य होगा।

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here