लखनऊ। उत्तर प्रदेश समेत देश भर के बेसिक शिक्षा विभाग के शिक्षकों के लिए हाल ही में आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस समय सबसे बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है। न्यायालय द्वारा शिक्षकों को एक वर्ष की बड़ी राहत देने के बाद अब शिक्षक समुदाय के भीतर चल रही बहस ने एक नया मोड़ ले लिया है। इस बार शिक्षकों की नाराजगी का केंद्र शासन या न्यायालय नहीं, बल्कि खुद उनके अपने शिक्षक संगठन और उनके पदाधिकारी बन गए हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, विशेषकर शिक्षकों के विभिन्न व्हाट्सएप समूहों में इस मुद्दे पर खुलकर अंतर्कलह सामने आ रही है। शिक्षक अपने ही संघों की कार्यप्रणाली और रणनीतियों पर तीखे सवाल उठा रहे हैं।
विभिन्न व्हाट्सएप समूहों में वायरल हो रही पोस्टों और कमेंट्स में शिक्षकों ने संगठनों के बीच आपसी तालमेल की भारी कमी को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। शिक्षकों का कहना है कि पिछले कई वर्षों से शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) के संवेदनशील मुद्दे पर संघर्ष, बैठकें, ज्ञापन सौंपने और आंदोलनों का दौर चलता रहा, लेकिन सभी संगठनों ने कभी भी एक साझा और स्पष्ट रणनीति सामने नहीं रखी। आम शिक्षकों का आरोप है कि हमारे बीच संगठन और बड़े-बड़े पदों पर बैठे पदाधिकारी तो बहुत हैं, लेकिन जब धरातल पर एकजुट होकर अपने हक के लिए लड़ने की बात आती है, तो सबकी राहें अलग-अलग दिखाई देती हैं। चर्चाओं में यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि जब एक शिक्षक संगठन किसी विरोध कार्यक्रम या रणनीति की घोषणा करता है, तो दूसरा संगठन तुरंत अपनी अलग राजनीति और एजेंडे के साथ सामने आ जाता है। संगठनों की इस आपसी खींचतान से आम शिक्षकों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा होती है। शिक्षकों का मानना है कि यदि सभी गुट अपने मतभेद भुलाकर एक संयुक्त मंच पर आ जाएं, तो उनकी आवाज शासन और नीति निर्माताओं तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंच सकती है।
इस बीच, कई शिक्षक संगठनों के शीर्ष पदाधिकारियों ने भी शीर्ष अदालत के इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। विशिष्ट बीटीसी शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष तारकेश्वर शाही ने टीईटी संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के इस नवीनतम निर्णय पर अपनी गहरी असहमति और नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला राहत देने के साथ-साथ आज लाखों शिक्षकों के मन में सेवा सुरक्षा को लेकर अनेक गंभीर प्रश्न और पीड़ा छोड़ गया है। शिक्षक नेताओं ने अपनी असहमति के पीछे शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई एक्ट) का हवाला देते हुए कानूनी तर्क पेश किए हैं। उनका कहना है कि आरटीई एक्ट की धाराओं के तहत देश में शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता निर्धारित करने का वैधानिक अधिकार केवल राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) को है। एनसीटीई द्वारा वर्ष 2010 में जारी अधिसूचना में यह स्पष्ट था कि आरटीई कानून लागू होने से पूर्व नियुक्त हो चुके शिक्षकों पर टीईटी की अनिवार्यता लागू नहीं होगी। इस कानूनी पेंच को रेखांकित करते हुए संगठन ने सभी शिक्षक संगठनों से अपील की है कि वे आपसी प्रतिद्वंद्विता छोड़ें और शिक्षकों के अधिकारों व नौकरी को बचाने के लिए एक साझा और निर्णायक संघर्ष की शुरुआत करें।
टीईटी की अनिवार्यता पर भड़के शिक्षकों ने उठाई साझा मंच की मांग


