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    आस्था का सैलाब: बुद्ध के शिष्यों के पवित्र अवशेषों के दर्शन को मंगोलिया में भीड़

    उलानबटार। भारत के ऐतिहासिक सांची स्तूप में संरक्षित भगवान बुद्ध के दो सबसे प्रमुख शिष्यों—अरहत सारिपुत्र और अरहत महामोग्लान (मौद्गल्यायन)—के पावन अवशेषों को 10 दिवसीय विशेष प्रदर्शनी के लिए मंगोलिया ले जाया गया है। बुद्ध पूर्णिमा (वेसाक दिवस) के पावन और ऐतिहासिक मौके पर इन पवित्र अवशेषों को मंगोलिया की राजधानी उलानबटार के प्रसिद्ध गंदनतेगचिनलिंग मठ (गंडेन मठ) में पूरे विधि-विधान और पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ स्थापित किया गया। इस पावन अवसर पर इन पवित्र अवशेषों के दर्शन और वंदन करने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु, बौद्ध भिक्षु और संघ के सदस्य उमड़ पड़े, जिन्होंने अत्यंत आदर, श्रद्धा और सम्मान के साथ इन अवशेषों का भव्य स्वागत किया।

    सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों को मिलेगी नई मजबूती

    यह पवित्र प्रदर्शनी 1 जून से शुरू होकर 10 जून तक आम जनता और श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खुली रहेगी। भारतीय वायु सेना के विशेष सी-17 'गजराज' (IL-76) विमान के जरिए इन बेहद दुर्लभ और ऐतिहासिक अवशेषों को पूरी सुरक्षा और राजकीय सम्मान के साथ नई दिल्ली से उलानबटार पहुंचाया गया। इस खास अवसर पर असम के राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य की अगुवाई में एक उच्च स्तरीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल भी मंगोलिया पहुंचा है। इस दौरान मंगोलिया में भारत के राजदूत अतुल मल्हारी गोत्सुर्वे और देश-विदेश के कई बड़े बौद्ध नेता व शीर्ष अधिकारी भी वहां उपस्थित रहे, जिन्होंने इस पल को ऐतिहासिक बताया।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर हुआ आयोजन

    इन पावन अवशेषों को मंगोलिया भेजे जाने की पृष्ठभूमि पिछले साल तैयार हुई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर 2025 में मंगोलिया के राष्ट्रपति उखनागीन खुरेलसुख की भारत यात्रा के दौरान इस भव्य आध्यात्मिक प्रदर्शनी को आयोजित करने की आधिकारिक घोषणा की थी। मंगोलियाई सरकार और वहां के नागरिकों की विशेष इच्छा के बाद संस्कृति मंत्रालय और अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ (IBC) के समन्वय से इस यात्रा को अमलीजामा पहनाया गया है। यह अनूठी पहल भारत और मंगोलिया के बीच सदियों पुराने गहरे आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत रिश्तों को एक नया आयाम देने का काम करेगी।

    लाखों श्रद्धालुओं के जुटने की उम्मीद

    बौद्ध धर्म में अरहत सारिपुत्र को जहां 'ज्ञान और धर्म का प्रधान' माना जाता है, वहीं अरहत महामोग्लान को उनकी 'अलौकिक व मानसिक शक्तियों' के लिए जाना जाता है। इन दोनों महापुरुषों के पवित्र अवशेष भारत की अमूल्य आध्यात्मिक धरोहर हैं जो मध्य प्रदेश के सांची विहार चैत्य में सुरक्षित रखे रहते हैं। इससे पहले इन पावन अवशेषों को कंबोडिया और थाईलैंड भी ले जाया गया था, जहां लाखों की संख्या में लोगों ने इनके दर्शन कर आशीर्वाद लिया था। मंगोलियाई प्रशासन का अनुमान है कि इस 10 दिवसीय प्रदर्शनी के दौरान देश और दुनिया भर से 10 लाख से अधिक श्रद्धालु और पर्यटक उलानबटार पहुंचकर अपनी गहरी आस्था प्रकट करेंगे।

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