बिलासपुर: छत्तीसगढ़ में फॉर्च्यून बिल्डकॉन के बहुचर्चित 'फॉर्च्यून एलिमेंट्स' आवासीय प्रोजेक्ट को लेकर पार्टनर्स के बीच छिड़ा कानूनी दंगल अब छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की चौखट तक पहुंच गया है। इस परियोजना में बड़े पैमाने पर वित्तीय और प्रशासनिक गड़बड़ियों का आरोप लगाते हुए फर्म के 15 फीसदी के हिस्सेदार मयंक अग्रवाल ने अदालत में याचिका दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे सभी संबंधित पक्षों का रुख सुनने के बाद अगले 60 दिनों के भीतर इस मामले पर कानून सम्मत निर्णय लें।
बिना सहमति 100 करोड़ का लोन लेने और फर्जी दस्तखत के आरोप
याचिकाकर्ता मयंक अग्रवाल ने बोदरी नगर परिषद समेत कई सरकारी महकमों में लिखित शिकायत दर्ज कराई है। उनके मुख्य आरोप निम्नलिखित हैं:
नियमों का उल्लंघन: प्रोजेक्ट का निर्माण सरकारी विभागों से पास (स्वीकृत) कराए गए मूल लेआउट से बिल्कुल अलग और अवैध रूप से किया जा रहा है।
वित्तीय धोखाधड़ी: फर्म के अन्य प्रमोटर्स ने उनकी मर्जी या लिखित सहमति के बिना कंपनी के प्रोजेक्ट और संपत्तियों को बैंकों के पास गिरवी रख दिया और करीब 100 करोड़ रुपये का भारी-भरकम लोन उठा लिया।
फर्जीवाड़ा: मयंक अग्रवाल का दावा है कि इस लोन को पास कराने और अन्य कागजी कार्रवाइयों के लिए कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेजों पर उनके जाली (फर्जी) हस्ताक्षर भी किए गए हैं।
हाई कोर्ट ने दिए 60 दिन के भीतर निराकरण के आदेश
सुनवाई के दौरान मयंक अग्रवाल ने अदालत को बताया कि उन्होंने 18 मई 2026 को ही नगर परिषद बोदरी के मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) को इस संबंध में शिकायत सौंपी थी, लेकिन रसूखदारों के दबाव में उस पर कोई एक्शन नहीं लिया गया।
इस पर हाई कोर्ट के जस्टिस एके प्रसाद की एकलपीठ (सिंगल बेंच) ने सख्त रुख अपनाया। हालांकि, फॉर्च्यून बिल्डकॉन के दूसरे हिस्सेदार पवन अग्रवाल व अन्य ने कोर्ट में दलील दी कि उन्हें इस शिकायत में सीधे तौर पर पक्षकार नहीं बनाया गया है। दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद हाई कोर्ट ने मयंक अग्रवाल को 7 दिनों के भीतर नए सिरे से शिकायत दर्ज कराने और उसकी एक-एक कॉपी बाकी पार्टनर्स को देने को कहा है। इसके बाद विभाग को 60 दिनों में मामले का निपटारा करना होगा।
नवा रायपुर कमर्शियल कोर्ट से पहले ही लग चुका है झटका
इस पूरे विवाद की एक कड़ी नवा रायपुर स्थित कमर्शियल कोर्ट से भी जुड़ी है। इससे पहले फॉर्च्यून बिल्डकॉन के अन्य साझीदारों ने कमर्शियल कोर्ट में एक अर्जी लगाकर मांग की थी कि मयंक अग्रवाल को सरकारी विभागों, बैंकों या अन्य जांच एजेंसियों में शिकायत करने से पूरी तरह रोका जाए (इंजंक्शन ऑर्डर दिया जाए)।
अदालत ने उनकी इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया था। कमर्शियल कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि यदि किसी व्यक्ति को किसी व्यावसायिक प्रोजेक्ट में अनियमितता या गड़बड़ी की जानकारी मिलती है, तो उसे संबंधित विभागों को सूचित करने के कानूनी अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
रेरा (RERA) पहले ही ठोक चुका है 10 लाख का जुर्माना
उल्लेखनीय है कि बिलासपुर के बोदरी में चल रहे इस फॉर्च्यून एलिमेंट्स प्रोजेक्ट पर कुछ समय पहले ही रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (CG RERA) ने भ्रामक विज्ञापन फैलाने के जुर्म में प्रमोटर पवन अग्रवाल पर 10 लाख रुपये का भारी जुर्माना लगाया था। रेरा की जांच में खुलासा हुआ था कि इस प्रोजेक्ट का सरकारी रजिस्ट्रेशन केवल 'प्लॉटेड डेवलपमेंट' (जमीन के प्लॉट बेचने) के तौर पर कराया गया था, लेकिन बिल्डर द्वारा अखबारों और डिजिटल विज्ञापनों में इसे एक लग्जरी 'हाउसिंग प्रोजेक्ट' (बने-बनाए मकान) के रूप में प्रमोट किया जा रहा था, जो सीधे तौर पर ग्राहकों को गुमराह करने जैसा था।
फिलहाल, फॉर्च्यून बिल्डकॉन का मैनेजमेंट इन सभी आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद बता रहा है, जबकि मयंक अग्रवाल का कहना है कि वे यह लड़ाई निवेशकों के पैसों की सुरक्षा और सच्चाई को सामने लाने के लिए लड़ रहे हैं।


