नई दिल्ली। भारत का राष्ट्रीय फल 'आम' अपनी मिठास और बेजोड़ स्वाद के कारण दुनिया भर में फलों का राजा कहलाता है। वैश्विक स्तर पर आम की 1,500 से अधिक विभिन्न किस्में पाई जाती हैं, जिनकी बागवानी 140 से भी ज्यादा देशों में की जाती है। इस मामले में भारत का दबदबा सबसे अनूठा है, क्योंकि अकेले हिंदुस्तान में ही आम की 1,000 से ज्यादा किस्में मौजूद हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश के मलिहाबादी दशहरी से लेकर महाराष्ट्र के रत्नागिरी अल्फोंसो तक शामिल हैं। आम के कुल वैश्विक उत्पादन में भारत शीर्ष पायदान पर काबिज है। हालांकि, भारत में पाई जाने वाली इन हजार किस्मों में से केवल 30 प्रजातियां ही ऐसी हैं, जिनकी बागवानी बड़े पैमाने पर व्यावसायिक (कमर्शियल) रूप से की जाती है ताकि उन्हें देश के अलग-अलग राज्यों के बाजारों में बेचने के साथ-साथ विदेशों में निर्यात किया जा सके।
जापान और नेपाल ने भारतीय आमों के आयात पर लगाया प्रतिबंध
हाल ही में भारतीय आम के निर्यात बाजार को कुछ अंतरराष्ट्रीय झटके भी लगे हैं। पिछले महीने जापान ने भारत से आने वाले आमों की खेप पर अस्थाई रोक लगा दी थी, जिसका मुख्य कारण भारत के ट्रीटमेंट सेंटर्स में पेस्ट-कंट्रोल (कीटनाशक प्रबंधन) की प्रक्रियाओं में पाई गई गंभीर खामियां थीं। पिछले दो दशकों में यह पहला मौका है जब जापान ने भारतीय आम को लेकर ऐसा सख्त रुख अपनाया है। इससे पहले जापान ने 'फ्रूट फ्लाइज़' (फल मक्खियों) के खतरे को देखते हुए प्रतिबंध लगाया था, जिसे साल 2006 में भारत सरकार द्वारा सुरक्षा के कड़े मानक तय करने के बाद हटाया गया था। जापान के बाद पड़ोसी देश नेपाल ने भी भारतीय आमों के आयात पर पाबंदियां लागू कर दी हैं, क्योंकि सीमा पर तैनात क्वारंटीन निरीक्षकों को जांच के दौरान आमों की एक खेप में तय सीमा से कहीं अधिक रासायनिक कीटनाशकों (पेस्टिसाइड्स) की मात्रा मिली थी।
वैश्विक बाजार में भारतीय आमों की मांग और प्रमुख खरीदार देश
भले ही कुछ देशों ने तकनीकी और रासायनिक कारणों से पाबंदियां लगाई हों, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय आमों की दीवानगी और मांग में कोई बड़ी कमी नहीं आई है। भारत से सबसे ज्यादा आम खरीदने वाले देशों की सूची में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) सबसे आगे है, जो कुल एक्सपोर्ट का अकेले 31.16 प्रतिशत हिस्सा खरीदता है और इसके लिए भारत को 16.28 मिलियन डॉलर का भुगतान करता है। संयुक्त अरब अमीरात मुख्य रूप से अल्फांसो, केसर, बंगनपल्ली और तोतापुरी किस्मों का आयात करता है। इसके बाद दूसरे नंबर पर ब्रिटेन है, जिसकी हिस्सेदारी 19.27 प्रतिशत (3.25 मिलियन डॉलर) है और वह अल्फांसो, केसर व लंगड़ा आम मंगाता है। तीसरे स्थान पर 17.72 प्रतिशत शेयर (0.57 मिलियन डॉलर) के साथ अमेरिका का नाम आता है, जो अल्फांसो, केसर और दशहरी का आयात करता है।
अन्य देशों का निर्यात शेयर और चुकाई जाने वाली कीमतें
विश्व के कई अन्य देशों में भी भारतीय आम की विभिन्न किस्मों की भारी मांग है। कुवैत कुल निर्यात का 4.65 प्रतिशत हिस्सा (0.84 मिलियन डॉलर) खरीदकर अल्फांसो, तोतापुरी और सफेदा आम मंगाता है। कनाडा का एक्सपोर्ट शेयर 4.19 प्रतिशत (0.20 मिलियन डॉलर) है, जहां अल्फांसो, केसर और बंगनपल्ली पसंद किए जाते हैं। सऊदी अरब तोतापुरी, अल्फांसो और लंगड़ा आम के लिए 1.20 मिलियन डॉलर चुकाकर 3.50 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है। कतर की बाजार हिस्सेदारी 2.90 प्रतिशत (0.88 मिलियन डॉलर) है, जहां अल्फांसो, केसर और बंगनपल्ली भेजे जाते हैं। इसके अतिरिक्त, नेपाल दशहरी, लंगड़ा और चौसा के लिए 2.10 प्रतिशत शेयर (0.60 मिलियन डॉलर) रखता है। सिंगापुर अल्फांसो, केसर और बादामी के लिए 1.80 प्रतिशत हिस्सेदारी (0.41 मिलियन डॉलर) तथा ओमान बंगनपल्ली और तोतापुरी किस्मों के लिए 1.10 प्रतिशत शेयर (0.30 मिलियन डॉलर) के साथ भारत के प्रमुख खरीदार देशों में शामिल हैं।


