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    बघेरे की दहशत: 7 दिन में 2 हमले, बकरी और बछड़े का शिकार

    अलवर। क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम खोहरी में एक बघेरे (तेंदुए) की लगातार आवाजाही और सक्रियता के कारण स्थानीय ग्रामीणों के बीच भारी डर और खौफ का माहौल बना हुआ है। बीते दिनों देर रात यह हिंसक वन्यजीव इंसानी आबादी क्षेत्र के बेहद करीब तक आ पहुंचा और गांव के ही एक किसान बाबूलाल स्वामी के आवासीय परिसर में एक मादा बघेरे ने अपने दो छोटे शावकों के साथ धावा बोल दिया। वहां बंधे गाय के एक बछड़े पर वन्यजीवों ने जानलेवा हमला कर दिया, जिससे बछड़े की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई। इस रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना के बाद से समूचे गांव में सन्नाटा पसरा हुआ है और ग्रामीणों ने अपनी तथा पशुओं की हिफाजत के लिए रातभर हाथों में लाठियां और टॉर्च थामकर पूरे गांव में ठीक ढंग से पहरा दिया। स्थानीय निवासियों ने इस आपात स्थिति की त्वरित सूचना वन विभाग के नियंत्रण कक्ष को दी, परंतु विभाग के कर्मचारी काफी देर तक अपनी-अपनी सीमाओं और दूसरी रेंज का तकनीकी हवाला देकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते रहे। अंततः काफी हीलाहवाली के बाद सरिस्का बफर जोन के अंतर्गत आने वाली ताल वृक्ष रेंज के अधिकारी अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे।

    खेतों में वन्यजीव की दस्तक से जुटी भीड़ और प्रशासनिक मुआयना

    स्थानीय ग्रामीण अमीचंद यादव ने इस विषय में विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि इस खूनी वारदात के अगले दिन भी मादा बघेरे को अपने शावकों के साथ गांव के आस-पास के कृषि खेतों में खुलेआम घूमते हुए देखा गया। जैसे ही यह बात जंगल की आग की तरह फैली, बड़ी संख्या में डरे-सहमे ग्रामीण लाठी-डंडों के साथ एक जगह पर एकत्रित हो गए। इस दौरान अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित पूरण स्वामी, राजेन्द्र यादव, विकास यादव, दिलीप स्वामी सहित दर्जनों अन्य ग्रामीण भी मौके पर डटे रहे। ग्रामीणों के भारी आक्रोश और दोबारा सूचना मिलने के बाद वन विभाग का दस्ता पुनः मौके पर पहुंचा और समूचे घटनास्थल का तकनीकी निरीक्षण कर वन्यजीव के पदचिह्नों (पगमार्क) का जायजा लिया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वन अधिकारियों ने मौके पर मौजूद ग्रामीणों से अत्यधिक सतर्कता बरतने और किसी भी सूरत में अकेले सुनसान खेतों अथवा झाड़ियों की तरफ न जाने की पुरजोर अपील की है।

    पिछले कई दिनों से मवेशियों पर हमले और रेस्क्यू की उठती मांग

    ग्रामवासियों का कहना है कि इस हिंसक बघेरे का मूवमेंट क्षेत्र में कोई नया नहीं है, बल्कि वह पिछले कई दिनों से आस-पास के गांवों में लगातार देखा जा रहा था। इस घटना से तकरीबन 7-8 दिन पहले पड़ोसी गांव कोठिया में भी इसी बघेरे ने एक किसान की बकरी को अपना निवाला बना डाला था। लगातार हो रही इन हिंसक वारदातों से समूचे अंचल के किसानों और पशुपालकों में अपनी जान-माल को लेकर चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और वन विभाग के उच्चाधिकारियों से बेहद कड़े शब्दों में मांग की है कि आबादी क्षेत्र में घूम रहे इस हिंसक कुनबे को पिंजरा लगाकर सुरक्षित तरीके से जल्द से जल्द रेस्क्यू किया जाए और उन्हें सरिस्का के घने जंगल क्षेत्र में स्थानांतरित किया जाए, ताकि भविष्य में किसी संभावित जनहानि या बड़े हादसे को समय रहते टाला जा सके।

    सीमा विवाद में उलझे रहे वनकर्मी और सुरक्षा के लिए विशेष हिदायत

    इस पूरे घटनाक्रम के दौरान वन विभाग की एक बेहद गैर-जिम्मेदाराना कार्यप्रणाली भी खुलकर उजागर हुई। जब बछड़े पर हमले के तुरंत बाद भयभीत ग्रामीणों ने आपातकालीन सहायता के लिए वनकर्मियों को फोन किया, तो सरिस्का वन प्रभाग के कर्मचारी इस क्षेत्र को बहरोड़ क्षेत्रीय रेंज के अधीन बताते रहे, वहीं दूसरी तरफ के कर्मचारी इसे सरिस्का का क्षेत्र कहकर टालते रहे। इस तरह दोनों ही रेंजों के वनकर्मी काफी देर तक एक-दूसरे के कार्यक्षेत्र का बहाना बनाकर टालमटोल करते रहे, जिससे ग्रामीणों में भारी रोष फैल गया। आखिरकार, विवाद बढ़ता देख सरिस्का बफर जोन के ताल वृक्ष रेंज अधिकारी ने मोर्चा संभाला और मौके पर पहुंचकर वस्तुस्थिति को संभाला। उन्होंने ग्रामीणों को आश्वस्त करते हुए विशेष हिदायत दी कि वे जंगलों और खेतों में अकेले जाने से पूरी तरह परहेज करें, शाम ढलने से पहले सुरक्षित अपने घरों को लौट आएं और पैंथर की कोई भी नई हलचल दिखने पर तुरंत इसकी सूचना सीधे उनके मोबाइल नंबर पर दें।

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