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    ईरान के नए सुप्रीम लीडर कहां हैं? 150 दिन से गायब मोजतबा खामेनेई पर सस्पेंस

    तेहरान: फरवरी 2026 में अमेरिका और इजराइल के संयुक्त सैन्य अभियान में पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खामेनेई के निधन के बाद मोजतबा खामेनेई को ईरान की कमान सौंपी गई थी, परंतु कमान संभालने के बाद से ही वे सार्वजनिक पटल से पूरी तरह ओझल हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इजरायल की मोसाद और अमेरिका की सीआईए उनकी गुप्त लोकेशन का पता लगाने के लिए व्यापक अभियान चला रही हैं। इस बीच यह खबर भी सामने आ रही है कि डिजिटल सर्विलांस से बचने के लिए उन्होंने संचार के सभी आधुनिक साधनों से पूरी तरह दूरी बना ली है, जिससे उनकी मौजूदगी को लेकर वैश्विक स्तर पर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।

    डिजिटल तकनीकों से पूरी तरह दूरी और सीक्रेट लोकेशन में शरण की आशंका

    अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों की रिपोर्टों के हवाले से दावा किया गया है कि मोजतबा खामेनेई ने पिछले लगभग पांच महीनों से किसी भी मोबाइल फोन, लैपटॉप, रेडियो अथवा डिजिटल सिग्नल प्रसारित करने वाले उपकरण का उपयोग नहीं किया है। माना जा रहा है कि वे किसी गुप्त भूमिगत ठिकाने में शरण लिए हुए हैं। कुछ खुफिया रिपोर्टों में यह भी कहा जा रहा है कि पूर्व में हुए हवाई हमले के दौरान उन्हें शारीरिक चोटें आई थीं, जिसके कारण वे उपग्रह आधारित पहचान प्रणाली और कैमरे से बचने के लिए पूर्णतः सतर्कता बरत रहे हैं और किसी भी प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक संपर्क से परहेज कर रहे हैं।

    साइबर निगरानी और तकनीकी ट्रैकिंग के जरिए खुफिया एजेंसियों का नेटवर्क

    उल्लेखनीय है कि पूर्व सर्वोच्च नेता का सुराग लगाने के लिए अमेरिकी और इजरायली खुफिया तंत्र ने तेहरान के यातायात नियंत्रण कैमरों को हैक करने से लेकर आधुनिक सिग्नल इंटरसेप्शन तकनीकों का सहारा लिया था। अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी और इजरायल की विशेष इकाई के आपसी समन्वय से उस समय शीर्ष अधिकारियों की सटीक लोकेशन ट्रैक की गई थी। हालांकि मोजतबा के मामले में कोई भी डिजिटल पदचिह्न न मिलने के कारण अब खुफिया एजेंसियां पारंपरिक मानव खुफिया तंत्र यानी 'ह्यूमन इंटेलिजेंस' पर निर्भर होने के लिए मजबूर हैं, जो कि एक अत्यंत जटिल और जोखिम भरा रास्ता माना जाता है।

    भावी रणनीतिक निर्णय और वैश्विक सुरक्षा एजेंसियों का कूटनीतिक दृष्टिकोण

    खुफिया गलियारों में इस बात की भी चर्चाएं हैं कि यदि सुरक्षा एजेंसियां उनके ठिकाने का सटीक पता लगा भी लेती हैं, तो आगे की कार्रवाई का फैसला सैन्य न होकर पूरी तरह रणनीतिक और राजनीतिक होगा। वाशिंगटन और येरुशलम के शीर्ष नीति निर्धारकों को यह तय करना होगा कि स्थिति को किस दिशा में ले जाना है। पूर्व वरिष्ठ खुफिया अधिकारियों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में किसी भी बड़े कदम से पूर्व क्षेत्रीय स्थिरता, भावी नेतृत्व की संभावनाओं और वैश्विक कूटनीतिक परिणामों का गहन विश्लेषण करना अत्यंत आवश्यक होगा।

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