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निलेश कांठेड़
भीलवाड़ा। शहर पर बरसात की पहली बौछार ने एक बार फिर विकास के खोखले दावों और प्रशासनिक लापरवाही की असलियत उजागर कर दी है। मानसून की सिर्फ शुरुआती बारिश ने ही भीलवाड़ा शहर को बेहाल कर दिया — सड़कें दरिया बन गईं, बिजली घंटों गुल रही, और नालों ने उफान मारते हुए व्यवस्थाओं की धज्जियाँ उड़ा दीं। जिन पर शहरवासी हर चुनाव में भरोसा जताते हैं, वही जनप्रतिनिधि और अफसर अब आँख मूंदे बैठे हैं।
हर साल मानसून से पहले करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के दावे होते हैं — सड़कों की मरम्मत, ड्रेनेज सिस्टम की सफाई और बाढ़ नियंत्रण की तैयारियाँ कागजों पर पूरी दिखती हैं। लेकिन जैसे ही कुछ इंच बारिश होती है, शहर पानी में डूब जाता है, और सिस्टम की सारी पोल खुल जाती है। नालों से गंदा पानी सड़कों पर बहने लगता है, अंडरब्रिज जलमग्न हो जाते हैं, और गड्ढों से भरी सड़कों पर वाहन चालकों की जान सांसत में आ जाती है।
जनता त्रस्त, व्यवस्था मस्त
शहर की हालत ऐसी हो चुकी है कि यह समझना मुश्किल हो जाता है कि यहां कोई सांसद, विधायक, महापौर या पार्षद भी हैं या नहीं। चुनावों से पहले मंचों पर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं — स्वच्छ, सुंदर और सुरक्षित शहर की बात होती है। लेकिन कुछ महीने बीतते ही वही चेहरे पुराने सिस्टम का हिस्सा बन जाते हैं, और हालात जस के तस बने रहते हैं।
राजनीतिक दलों का चरित्र भी स्पष्ट हो चुका है — चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों सत्ता में रहते हुए एक जैसे दिखते हैं। विपक्ष में रहते हुए जो नेता मानसून से पहले खर्चों पर सवाल उठाते हैं, सत्ता में आते ही खुद उन्हीं खर्चों का हिस्सा बन जाते हैं। यही वजह है कि जनता अब नेताओं और अफसरों को एक ही थैली के चट्टे-बट्टे समझने लगी है।
सवाल अब सिर्फ सड़कों का नहीं, व्यवस्था की नीयत का है
जब 2 इंच बारिश में शहर समुंदर बन जाए, तो यह सोचना स्वाभाविक है कि अगर कभी बादल फट पड़े, तो हालात कैसे होंगे? बारिश न केवल प्राकृतिक आपदा लाती है, बल्कि यह शासन की तैयारी की परीक्षा भी लेती है, जिसमें हमारा तंत्र बार-बार फेल होता आया है। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है कि जिन सड़कों और नालों की सफाई और मरम्मत के लिए हर साल भारी बजट पारित होता है, वह सिर्फ कागजी कार्रवाई बनकर रह जाता है?
यह दृश्य देखकर लगता है कि हमारे नेता और अधिकारी अब या तो नीचे देख कर चलना भूल गए हैं, या फिर ‘गांधारी’ बनकर जीना सीख गए हैं। उन्हें अब आमजन की पीड़ा से कोई सरोकार नहीं है — उनकी प्राथमिकता सिर्फ अपनी कुर्सी और आकाओं को खुश रखना बन चुकी है।
अब जनता को तय करना होगा
शहर की यह दुर्दशा और इसके लिए जिम्मेदार चेहरों की उदासीनता इस बात की पुकार है कि अब समय है बदलाव का, जागरूक जनमत का। जब जनता सवाल पूछेगी, जवाबदेही मांगेगी और केवल नारों के आधार पर वोट नहीं देगी — तभी व्यवस्थाएं सुधरेंगी।
बारिश आने से पहले जो वादे किए गए थे, अब जब पानी सड़कों पर है, तो सवाल भी वहीं होने चाहिए —
“पैसा कहां गया?”,
“काम किसने किया?”,
“जिम्मेदारी किसकी है?”
अगर इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तो यह स्पष्ट है —
शहर की नैया फिलहाल भ्रष्टाचार और कुशासन की धारा में बह रही है।


