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    हाईकोर्ट का सख्त रुख: सरकारी जमीन पर कब्जे नियमित करने के आदेश पर लगाई रोक

    जोधपुर। राजस्थान उच्च न्यायालय ने सरकारी भूमि पर किए गए अवैध कब्जों और बस्तियों को वैध करने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा आयोजित किए जा रहे शहरी सेवा शिविरों पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने नगरीय विकास एवं आवासन (यूडीएच) विभाग द्वारा 10 जून 2026 को जारी किए गए सर्कुलर पर रोक लगाते हुए विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और शासन सचिव से जवाब तलब किया है कि यह आदेश किस विधिक अधिकार के तहत निकाला गया।

    हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मांगा व्यक्तिगत हलफनामा

    कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायमूर्ति मनीष शर्मा की डिवीज़न बेंच ने यह अंतरिम रोक 'पब्लिक अगेंस्ट करप्शन' नामक संस्था द्वारा दायर की गई जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए लगाई। अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए यूडीएच विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और शासन सचिव को निर्देश दिए हैं कि वे निजी तौर पर शपथ-पत्र (एफिडेविट) पेश कर इस मामले में सरकार का रुख साफ करें। गौरतलब है कि सरकार ने 10 जून के सर्कुलर के जरिए 12 जून से 15 जुलाई तक पूरे सूबे में शहरी सेवा शिविर लगाकर अतिक्रमणों के नियमन की कवायद शुरू की थी, जिस पर अब ब्रेक लग गया है।

    सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन

    अदालत में याचिकाकर्ता के वकीलों ने दलील दी कि राज्य सरकार का यह कदम सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के पूरी तरह खिलाफ है। उन्होंने तर्क दिया कि देश की शीर्ष अदालत कई मर्तबा साफ कह चुकी है कि अवैध निर्माणों और कब्जों के साथ किसी तरह की रियायत नहीं की जा सकती। नियमन की प्रक्रिया केवल विशेष हालातों में, पूरी मैपिंग और सर्वे के बाद एकमुश्त उपाय के तौर पर ही की जानी चाहिए। याचिका में यह बात भी उठाई गई कि सरकार पहले ही 1 जनवरी 1999 तक के अतिक्रमणों को वैध करने की एकमुश्त योजना ला चुकी है, ऐसे में बार-बार इस तरह की योजनाएं लाना भू-माफियाओं को बढ़ावा देने जैसा है।

    गलत परंपरा और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलने की आशंका

    सुनवाई के दौरान यह आशंका भी जताई गई कि इस तरह की रियायतों से समाज में एक गलत संदेश जाता है कि पहले सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा कर लिया जाए और बाद में उसे सरकार से पास करवा लिया जाए। इससे शहरों का सुनियोजित विकास पूरी तरह ठप हो जाता है, सिस्टम में भ्रष्टाचार पैर पसारता है और जो नागरिक ईमानदारी से कानून का पालन करते हैं, उनके अधिकारों का हनन होता है। फिलहाल उच्च न्यायालय की अगली सुनवाई तक सरकार की इस योजना पर पूरी तरह रोक रहेगी।

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