मुंबई: बॉम्बे हाई कोर्ट ने वर्ष 2003 में हुए एक दर्दनाक सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हुई एक बच्ची के पिता को लेकर बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला सुनाया है। दुर्घटना की शिकार होने के बाद वह मासूम बच्ची करीब सोलह वर्षों तक कोमा में यानी पूरी तरह अचेत अवस्था में जिंदगी और मौत के बीच जूझती रही और आखिरकार साल 2019 में उसने दम तोड़ दिया था। इस लंबी और पीड़ादायक अवधि के दौरान परिवार को मानसिक और आर्थिक रूप से भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था, जिसे ध्यान में रखते हुए अदालत ने अब एक बड़ा कदम उठाया है।
कोमा में रही बेटी की मौत पर अदालत ने लगाया तगड़ा जुर्माना
सोलह साल तक अचेत अवस्था में रहने वाली अपनी बेटी की असामयिक मौत के बाद पीड़ित पिता ने उचित और ज्यादा मुआवजे की मांग को लेकर कानूनी लड़ाई जारी रखी थी। पिता की इस जायज मांग को पूरी तरह सही और तार्किक मानते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने संबंधित इंश्योरेंस कंपनी पर तगड़ा जुर्माना लगाया है। अदालत ने बीमा कंपनी के ढुलमुल रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए निर्देश दिया है कि वह पीड़ित पिता को छह फीसदी वार्षिक ब्याज दर के साथ कुल सैंतीस लाख रुपये का बढ़ा हुआ मुआवजा तुरंत जारी करे ताकि पीड़ित परिवार को कुछ राहत मिल सके।
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद पीड़ित परिवार को मिला बड़ा न्याय
इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि इतने लंबे समय तक किसी अपने को अचेत अवस्था में देखना और उसकी देखभाल करना किसी भी परिवार के लिए बेहद कष्टकारी होता है। इंश्योरेंस कंपनी द्वारा शुरुआती दौर में तय किया गया मुआवजा इस भीषण त्रासदी और इलाज में हुए भारी-भरकम खर्च के मुकाबले बेहद कम था। पिता ने हार न मानते हुए अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था, जहां वर्षों की लंबी प्रतीक्षा और कानूनी दलीलों के बाद आखिरकार उच्च न्यायालय ने उनके पक्ष में यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है।
बीमा कंपनी को ब्याज सहित पूरी राशि भुगतान करने का आदेश
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि हादसे के समय से लेकर अब तक के समय को देखते हुए मुआवजे की राशि में की गई यह वृद्धि पूरी तरह न्यायसंगत है। इंश्योरेंस कंपनी को आदेश दिया गया है कि वह मुआवजे की मूल राशि के साथ-साथ तय की गई छह प्रतिशत की वार्षिक ब्याज दर को जोड़कर पूरी रकम का भुगतान जल्द से जल्द सुनिश्चित करे। इस फैसले से साफ हो गया है कि सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में बीमा कंपनियां अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती हैं और उन्हें पीड़ितों के नुकसान की उचित भरपाई करनी ही होगी।


