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    नर्मदा की छाती छलनी कर रहे माफिया! बड़वानी में अवैध रेत उत्खनन का खुलासा

    बड़वानी। मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में नर्मदा नदी के किनारों पर नियमों को ताक पर रखकर प्राकृतिक संपदा का दोहन धड़ल्ले से जारी है। जिला मुख्यालय से महज कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित पीपलूद, बड़दा और खेड़ी गांवों के डूब क्षेत्र में जब जमीनी हकीकत देखी गई, तो वहां का नजारा बेहद चौंकाने वाला मिला। मां नर्मदा के आंचल को छलनी कर भारी-भरकम मशीनों के जरिए दिन-रात रेत का अवैध उत्खनन किया जा रहा है, जिससे न सिर्फ कानून का उल्लंघन हो रहा है बल्कि पवित्र नदी का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है।

    नर्मदा किनारे बेखौफ चल रहा है भारी मशीनों से अवैध उत्खनन

    नदी के कछार में चारों तरफ नियम-कायदों की धज्जियां उड़ती साफ दिखाई दे रही हैं, मानो वहां कोई वैध और व्यवस्थित औद्योगिक उत्खनन स्थल संचालित हो रहा हो। पानी के बिल्कुल करीब से बड़ी-बड़ी पोकलेन मशीनें लगातार नदी का सीना चीरकर गहरे गड्ढे बना रही हैं और वहां से निकाली जा रही रेत को डंपरों और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में भरा जा रहा है। मौके पर करीब आधा दर्जन पोकलेन मशीनें और दर्जनों भारी वाहन बिना किसी डर के लगातार रेत का परिवहन करने में जुटे हैं, जिससे पूरे इलाके में धूल और मशीनों का शोर गूंज रहा है।

    अस्थायी टपरियों से निगरानी और जिम्मेदार विभागों की रहस्यमयी चुप्पी

    स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक यह पूरा खेल बेहद संगठित तरीके से लंबे समय से खेला जा रहा है, जिसके लिए बाकायदा सुरक्षा तंत्र भी बनाया गया है। पीपलूद गांव से लेकर खदान तक के रास्तों में कई अस्थायी टपरियां बनाई गई हैं, जहां बैठे लोग आने-जाने वाले अनजान व्यक्तियों और अधिकारियों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखते हैं और खनन माफिया को तुरंत सूचना भेजते हैं। इस बेहद बड़े स्तर पर चल रहे कारोबार के बावजूद जिम्मेदार खनिज विभाग और स्थानीय प्रशासन की सक्रियता कहीं नजर नहीं आ रही है, जिससे उनके संरक्षण और मूकदर्शक बने रहने पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

    सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी के नियमों के उल्लंघन पर मेधा पाटकर ने उठाए सवाल

    नर्मदा नदी की इस दुर्दशा को लेकर नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यालय में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने भी तीखे तेवर अपनाए हैं। उन्होंने जिला प्रशासन और खनिज विभाग की कार्यप्रणाली को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के स्पष्ट निर्देशों और प्रतिबंधों के बावजूद तटीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर उत्खनन किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि बाहरी रसूखदार लोग रॉयल्टी और ठेके की आड़ लेकर तय सीमाओं और नियमों के विपरीत जाकर प्रकृति को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं।

    नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर संकट और खनिज अधिकारी का गोलमोल जवाब

    पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि नदी के किनारों पर इसी तरह अनियंत्रित और मशीनीकृत खनन जारी रहा, तो इससे नर्मदा का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित होगा, तटों का कटाव बढ़ेगा और जैव विविधता पूरी तरह नष्ट हो जाएगी। इस पूरे गंभीर मामले पर जब जिला खनिज अधिकारी दिनेश डुडवे से बात की गई तो उन्होंने गोलमोल पक्ष रखते हुए सिर्फ इतना बताया कि संबंधित रेत खदान का ठेका तीन वर्ष की अवधि के लिए दिया गया है, लेकिन वे इस बात का स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए कि मौके पर चल रही हैवी मशीनों की गतिविधियां स्वीकृत क्षेत्र और एनजीटी की निर्धारित शर्तों के अनुरूप हैं या नहीं।

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