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    रंगदारी और रंजिश में जबलपुर दहला, सुअर मारा बम से हमलों का आरोप

    जबलपुर: देश की सेना के लिए घातक युद्धक सामग्री और उन्नत बम बनाने के लिए विश्व पटल पर विख्यात जबलपुर शहर इन दिनों एक बेहद चिंताजनक मोड़ से गुजर रहा है। अपनी सैन्य निर्माण फैक्ट्रियों की वजह से सुरक्षाबलों की रीढ़ माना जाने वाला यह क्षेत्र अब स्थानीय अपराधियों द्वारा की जा रही अंधाधुंध बमबाजी की वारदातों के कारण कुख्यात हो रहा है। पिछले कुछ महीनों के भीतर शहर के विभिन्न इलाकों में दहशत फैलाने, रंगदारी वसूलने और आपसी दुश्मनी निकालने के लिए घरों और दुकानों पर देसी बम फेंकने की दर्जनों घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिसने स्थानीय कानून व्यवस्था की स्थिति पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।

    वारदातों के पीछे का मुख्य कारण और अपराधियों की मानसिकता

    स्थानीय जांच अधिकारियों और समाजशास्त्रियों के मुताबिक, इन दिनों अपराधियों के बीच सोशल मीडिया पर अपना दबदबा कायम करने और अपराध की दुनिया में नाम कमाने की एक होड़ सी मची हुई है। बदमाश मामूली कहासुनी, पुरानी रंजिश या फिर अवैध वसूली (हफ्ता वसूली) की मांग पूरी न होने पर सीधे लोगों के घरों को निशाना बना रहे हैं। कई मामलों में तो नकाबपोश बदमाश हाथों में घातक हथियारों की जगह सीधे ज्वलनशील और विस्फोटक सामग्री से बने देसी बम लेकर घूमते हैं और सरेराह या रिहायशी कॉलोनियों में धमाके कर चंद सेकंडों में पूरे इलाके को धुएं और खौफ के साए में धकेल देते हैं।

    शहर के विभिन्न क्षेत्रों में हुई सिलसिलेवार घटनाएं

    जबलपुर के विभिन्न थाना क्षेत्रों जैसे माढ़ोताल, रांझी, घमापुर और बरेला से लगातार ऐसी खौफनाक वारदातें दर्ज की गई हैं। माढ़ोताल के करमेता में एक बड़े कारोबारी से लाखों की रंगदारी न मिलने पर उनके मकान को निशाना बनाया गया, तो वहीं घमापुर और बरेला में पुरानी रंजिश के चलते की गई बमबाजी में निर्दोष महिलाएं और बच्चे गंभीर रूप से घायल हुए हैं। इसके अतिरिक्त, नशे के आदी तत्वों द्वारा रोके जाने पर बिल्डरों के आवासों पर हमले करने और यहां तक कि आपसी गलतफहमी या शराब के दामों को लेकर हुए विवादों में व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और अधिवक्ताओं के घरों पर भी ताबड़तोड़ बम फेंकने के मामले सामने आए हैं, जिसने नागरिकों की रातों की नींद उड़ा दी है।

    'सूअर मारा' बम का अवैध कारोबार और इसका इतिहास

    विशेषज्ञों का कहना है कि शहर में कानून व्यवस्था के लिए सिरदर्द बन चुके ये विस्फोटक स्थानीय स्तर पर 'सूअर मारा बम' के नाम से जाने जाते हैं। ऐतिहासिक रूप से इनका निर्माण ग्रामीण और जंगली इलाकों में जंगली सूअरों को भगाने या पकड़ने के लिए बेहद आसान तकनीकों से किया जाता था। आतिशबाजी और पटाखों में इस्तेमाल होने वाले सामान्य बारूद और कंकड़ों की मदद से तैयार होने वाले ये बम दिखने में भले ही छोटे हों, लेकिन किसी इंसान के पास फटने पर यह उसे अपाहिज करने या जान लेने की क्षमता रखते हैं। वर्तमान में शहर के भीतर इस अवैध निर्माण और इसकी आसान उपलब्धता ने अपराधियों के हौसले सातवें आसमान पर पहुंचा दिए हैं।

    प्रशासनिक निष्क्रियता और भविष्य की बड़ी चुनौतियां

    इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि आखिर इन अवैध निर्माण इकाइयों और बारूद की अवैध सप्लाई चेन पर पुलिसिया तंत्र शिकंजा कसने में नाकाम क्यों साबित हो रहा है। यद्यपि पुलिस अधिकारियों का दावा है कि वे त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपियों को सलाखों के पीछे भेज रहे हैं, लेकिन जब तक इन विस्फोटकों के निर्माण स्थलों और मुख्य सप्लायरों को जमींदोज नहीं किया जाता, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान असंभव है। यदि समय रहते इस नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में यह स्थिति किसी बड़े जनहानि का कारण बन सकती है।

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