साहित्य साधना पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शिबन कृष्ण रैणा ने साझा किए जीवन, अनुवाद और सृजन के अनुभव
प्रहलाद पुष्पद, वरिष्ठ पत्रकार
अलवर। राजस्थान साहित्य अकादमी के प्रथम अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शिबन कृष्ण रैणा का मानना है कि “वतन से दूरी ही मेरी साहित्य साधना की मूल प्रेरणा है।” कश्मीर में जन्मे और राजस्थान को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले डॉ. रैणा ने एक विशेष बातचीत में साहित्य, अनुवाद, आत्मकथा लेखन और अपने रचनात्मक सफर से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विचार साझा किए।
वरिष्ठ पत्रकार प्रहलाद पुष्पद से बातचीत में डॉ. रैणा ने कहा कि अनुवाद किसी रचना की केवल नकल नहीं, बल्कि उसका पुनर्सृजन होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अनुवाद को द्वितीय श्रेणी का लेखन मानना उचित नहीं है। उनके अनुसार अनुवादक तभी सफल हो सकता है, जब वह मूल रचना की अनुभूति, आशय और अभिव्यक्ति को पूरी तरह आत्मसात कर उसे दूसरी भाषा में उसी प्रभाव के साथ प्रस्तुत करे।
उन्होंने कहा कि मौलिक लेखन और अनुवाद की रचना-प्रक्रिया में मूलभूत समानता होती है। अनुवादक भी एक सर्जक होता है, क्योंकि वह मूल भावों को नई भाषा में पुनर्जीवित करता है।
डॉ. रैणा ने हरिवंश राय बच्चन के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि अनुवाद मौलिक प्रेरणा के साथ किया जाए तो उसका महत्व किसी मौलिक रचना से कम नहीं होता। उनके अनुसार साहित्यिक अनुवाद में शब्दशः अनुवाद की अपेक्षा भावानुवाद अधिक प्रभावी और जीवंत होता है।
दो भाषाओं और संस्कृतियों के बीच सेतु है अनुवाद
उन्होंने कहा कि अनुवाद केवल भाषाओं को नहीं जोड़ता, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और जीवन मूल्यों का आदान-प्रदान भी कराता है। आज अनेक विश्वविद्यालयों में अनुवाद को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना इसी बढ़ती आवश्यकता का प्रमाण है।
अच्छा लेखक ही बन सकता है अच्छा अनुवादक
डॉ. रैणा का मानना है कि एक सफल अनुवादक बनने के लिए पहले अच्छा लेखक होना आवश्यक है। लेखक की भाषाई समझ, अभिव्यक्ति क्षमता और अनुभव ही अनुवाद को प्रभावशाली बनाते हैं।
आत्मकथा लेखन सबसे कठिन विधाओं में एक
आत्मकथा लेखन पर उन्होंने कहा कि अपने बारे में लिखना जितना सरल दिखाई देता है, उतना होता नहीं। आत्मकथ्य और आत्मप्रशंसा के बीच की सीमा को बनाए रखना किसी भी लेखक की सबसे बड़ी परीक्षा होती है।
कश्मीर विश्वविद्यालय से शुरू हुई साहित्य यात्रा
डॉ. रैणा ने बताया कि वर्ष 1960-61 में कश्मीर विश्वविद्यालय में हिन्दी में स्नातकोत्तर अध्ययन के दौरान साहित्य परिषद की गोष्ठियों और संगोष्ठियों ने उनके भीतर साहित्य का बीज बोया। उनके गुरु डॉ. शशिभूषण सिंहल ने प्रारंभिक रचनाओं के प्रकाशन में महत्वपूर्ण सहयोग दिया।
गुरुजनों की प्रेरणा से बने दो संस्कृतियों के सेतु
उन्होंने बताया कि गुरुजनों की प्रेरणा से उन्होंने कश्मीर की सांस्कृतिक और साहित्यिक धरोहर को हिन्दी जगत तक पहुंचाने का संकल्प लिया। इसी क्रम में उन्होंने कश्मीर के इतिहास, संगीत, कहावतों और सांस्कृतिक परंपराओं पर अनेक लेख और पुस्तकें लिखीं।
राजस्थान बना कर्मभूमि
नवंबर 1963 में कश्मीर छोड़ने के बाद वे शोध कार्य के लिए कुरुक्षेत्र पहुंचे। कश्मीरी और हिन्दी कहावतों के तुलनात्मक अध्ययन पर शोध पूरा करने के बाद वर्ष 1966 में राजस्थान कॉलेज शिक्षा सेवा में चयनित हुए। उन्होंने भीलवाड़ा, नाथद्वारा और वर्ष 1978 से राजकीय स्नातकोत्तर कला महाविद्यालय, अलवर में अध्यापन किया। इसी दौरान उन्होंने संत कवयित्री ललद्यद सहित अनेक विषयों पर महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्य किया।
वतन की दूरी बनी सबसे बड़ी प्रेरणा
डॉ. रैणा ने कहा कि अपने वतन से दूर रहने के कारण मन में जो रिक्तता और पीड़ा पैदा हुई, वही उनकी साहित्य साधना की सबसे बड़ी प्रेरणा बनी। उन्होंने उस पीड़ा को सृजन की ऊर्जा में बदलते हुए साहित्य और अनुवाद के क्षेत्र में निरंतर कार्य किया। उनकी पहली पुस्तक ‘कश्मीरी भाषा और साहित्य’ वर्ष 1972 में प्रकाशित हुई।
मौलिक कहानियों से भी बनाई अलग पहचान
अनुवाद के साथ-साथ उन्होंने मौलिक कहानियां भी लिखीं। ‘शतरंज का खेल’, ‘मोहपाश’, ‘अंतराल’ और ‘रिश्ते’ जैसी कहानियों ने यह सिद्ध किया कि वे केवल अनुवादक ही नहीं, बल्कि एक सशक्त मौलिक कथाकार भी हैं।
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