मुंबई: राष्ट्रीय राजधानी में नीट पेपर लीक मामले को लेकर प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज के बाद देशभर में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस संवेदनशील मुद्दे पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने अत्यंत कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने शांतिपूर्ण ढंग से आवाज उठा रहे छात्र-छात्राओं पर पुलिसिया बल प्रयोग की घोर निंदा करते हुए केंद्र सरकार और प्रशासनिक तंत्र से कई तीखे और गंभीर सवाल पूछे हैं।
छात्रों पर लाठीचार्ज के विरोध में राज ठाकरे ने उठाए सवाल
मनसे प्रमुख ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी बात रखते हुए कहा कि यदि विद्यालयों में बच्चों की पिटाई करने पर शिक्षकों के खिलाफ कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाती है, तो दिल्ली की सड़कों पर असहाय छात्रों पर लाठियां बरसाने वाले पुलिसकर्मियों और ऐसा दमनकारी आदेश जारी करने वाले उच्च अधिकारियों पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती। उन्होंने आरोप लगाया कि भीड़ को हटाने के नाम पर छात्रों को जिस बेरहमी से पीटा गया है, वह बदला लेने जैसी भावना को दर्शाता है।
बिना शीर्ष अधिकारियों के आदेश के संभव नहीं इतना बल प्रयोग
राज ठाकरे ने जारी घटनाक्रम का हवाला देते हुए कहा कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान जिस तरह से आम छात्रों और वहां मौजूद नागरिकों को निशाना बनाया गया, वह शीर्ष अधिकारियों की मंजूरी के बिना संभव ही नहीं है। उन्होंने कहा कि नीट परीक्षा की कथित गड़बड़ियों और अनिश्चित भविष्य से परेशान होकर छात्र सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए थे। ऐसे में लोकतांत्रिक तरीके से अपना गुस्सा जाहिर कर रहे देश के युवाओं पर इस प्रकार का बर्बर हमला पूरी तरह से अनुचित और अलोकतांत्रिक है।
संवैधानिक सिद्धांतों और अंतरराष्ट्रीय मानकों की अनदेखी पर चिंता
उन्होंने कहा कि दुनिया के तमाम विकसित लोकतांत्रिक देशों में पुलिस बल के किसी भी प्रयोग की निष्पक्ष जांच की जाती है, विशेषकर आदेश देने वाले प्राधिकारियों की जवाबदेही तय की जाती है। भारत के संवैधानिक ढांचे में भी संयम और जवाबदेही के सिद्धांत शामिल हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या व्यवस्था चला रहे लोग खुद को संविधान से भी ऊपर समझने लगे हैं, जो असहमति की आवाजों को दबाने के लिए इस हद तक बल प्रयोग का सहारा ले रहे हैं।
लोकतंत्र में असहमति का सम्मान और संयम जरूरी
मनसे प्रमुख ने जोर देकर कहा कि किसी भी परिपक्व लोकतंत्र की पहचान इस बात से नहीं होती कि वह असहमति और विरोध की आवाजों को कितनी सख्ती से कुचलता है, बल्कि इस बात से होती है कि वह ऐसी आवाजों को कितने संयम और संवेदनशीलता से सुनता है। उन्होंने सिविल सोसाइटी, विचारकों और सभी सांसदों से अपील की है कि वे युवाओं के इस गंभीर मुद्दे पर संसद से लेकर सार्वजनिक मंचों तक गहन चर्चा करें और व्यवस्था को संवेदनशील बनाने पर जोर दें।


