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    मेडिकल साइंस का चमत्कार: क्या मृत्यु के बाद भी अमर रहेगी आपकी चेतना? जानें इस तकनीक के पीछे का सच

    कल्पना कीजिए कि किसी व्यक्ति की सांसें थम चुकी हों, दिल ने धड़कना बंद कर दिया हो और चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया हो। आमतौर पर इसे ही जीवन का पूर्ण विराम मान लिया जाता है। पर क्या यह मुमकिन है कि कोई इंसान मौत की आगोश से वापस लौट आए? सुनने में यह भले ही किसी हॉलीवुड की साइंस फिक्शन फिल्म का दृश्य लगे, लेकिन अमेरिका की एक आधुनिक स्टार्टअप कंपनी इस अकल्पनीय विचार को हकीकत में बदलने की जद्दोजहद में जुटी है। वैज्ञानिकों ने इस दिशा में अपने कदम आगे बढ़ा दिए हैं, जो आने वाले समय में अमरता की परिभाषा को बदल सकता है।

    सुअर के मस्तिष्क पर सफल परीक्षण और इंसानों पर अध्ययन की तैयारी

    अमेरिकी स्टार्टअप कंपनी 'नेक्टोम' ने हाल ही में एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए मृत्यु के बाद एक सुअर के दिमाग को पूरी तरह सुरक्षित रखने का दावा किया है। विज्ञान के इतिहास में यह पहली बार है जब किसी स्तनधारी जीव के मस्तिष्क की सूक्ष्म कोशिकीय संरचना को मरने के बाद बिना किसी नुकसान के सहेज कर रखा गया है। इसके लिए सुअरों का चयन इसलिए किया गया क्योंकि उनका दिमाग और रक्त संचार प्रणाली काफी हद तक इंसानी तंत्र से मेल खाती है। अब वैज्ञानिक इसी तकनीक को इंसानों पर आजमाने की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। हालांकि, जानकारों का स्पष्ट कहना है कि यह प्रयोग किसी मृत को तुरंत जीवित करने का जरिया नहीं है, बल्कि इसे अभी सिर्फ मस्तिष्क संरक्षण (ब्रेन प्रिजर्वेशन) की एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए।

    क्या है 'कनेक्टोम' तकनीक और न्यूरॉन्स के नेटवर्क का रहस्य

    यह पूरी वैज्ञानिक खोज 'कनेक्टोम' की अवधारणा पर टिकी है। दरअसल, हमारे दिमाग के भीतर अरबों न्यूरॉन्स और उनके बीच बने आपसी संपर्कों (सिनेप्स) के जाल को कनेक्टोम कहा जाता है। न्यूरोसाइंटिस्ट्स का मानना है कि किसी भी इंसान की यादें, उसका व्यक्तित्व, सोचने का नजरिया और चेतना इसी जटिल नेटवर्क के भीतर सुरक्षित रहती हैं। यदि इस नेटवर्क के ढांचे को नष्ट होने से बचा लिया जाए, तो सैद्धांतिक रूप से उस व्यक्ति के मानसिक वजूद को हमेशा के लिए अमर रखा जा सकता है। इस तकनीक के जरिए भविष्य में इंसानी दिमाग का एक विस्तृत नक्शा (मैप) तैयार करने में मदद मिलेगी, जिससे अल्जाइमर, पार्किंसन और डिमेंशिया जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के इलाज की राह आसान हो सकती है।

    केमिकल लॉकिंग और -32 डिग्री तापमान पर सदियों तक संरक्षण

    मस्तिष्क को सुरक्षित करने की यह प्रक्रिया बेहद जटिल और समय की पाबंद है। नेक्टोम के वैज्ञानिकों ने सुअर की मृत्यु के ठीक 10 मिनट के भीतर उसके हृदय में एक विशेष ट्यूब डालकर सारा खून बाहर निकाला। इसके बाद उसमें ऐसे खास रसायनों का प्रवाह किया गया जो कोशिकाओं और प्रोटीनों को उनकी मूल स्थिति में 'लॉक' कर देते हैं। इसके बाद दिमाग के भीतर मौजूद पानी को हटाकर एक विशेष तरल पदार्थ भरा गया, जो ऊतकों को बर्फ के क्रिस्टल में बदलने से रोकता है। अंत में, मस्तिष्क का तापमान घटाकर -32 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचा दिया गया, जिस पर ये टिश्यू सैकड़ों वर्षों तक सुरक्षित रह सकते हैं। जांच में सामने आया कि यदि मौत के 10 से 14 मिनट के भीतर यह प्रक्रिया शुरू न की जाए, तो शरीर के एंजाइम ऊतकों को नष्ट करना शुरू कर देते हैं।

    हालांकि, वर्तमान विज्ञान के पास अभी ऐसी कोई तकनीक नहीं है जो इस सुरक्षित रखे गए दिमाग से यादों या चेतना को दोबारा पढ़ सके। चूहे के दिमाग के एक बेहद छोटे हिस्से का नक्शा बनाने में ही वैज्ञानिकों को 7 साल लग गए थे, जबकि इंसानी दिमाग उससे करीब 1000 गुना अधिक जटिल है। बहरहाल, इस प्रयोग ने यह साबित कर दिया है कि दिल धड़कना बंद होने के तुरंत बाद ही मस्तिष्क का डेटा नष्ट नहीं होता, बल्कि उसे सही तकनीक से सहेजा जा सकता है।

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