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    सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे का नेटवर्क, कौन चला रहा सिंडिकेट?

    भोपाल। मध्यप्रदेश के प्रमुख शहरों में सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जों का एक बड़ा मामला सामने आया है। भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक कीमत की सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे होने का दावा किया जा रहा है, जिससे प्रशासनिक कार्यप्रणाली और सरकारी जमीनों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

    धार्मिक ढांचों और ट्रस्ट की आड़ में कब्जे

    कई स्थानों पर धार्मिक ढांचों की आड़ में सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे किए गए हैं और धीरे-धीरे वहां पक्के निर्माण भी खड़े कर दिए गए हैं। कुछ मामलों में तो ट्रस्ट और समितियां बनाकर इन सरकारी संपत्तियों से व्यावसायिक और आर्थिक गतिविधियां संचालित किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। जानकारों का कहना है कि लंबे समय तक कार्रवाई न होने के कारण शुरुआती अस्थायी अतिक्रमण धीरे-धीरे स्थायी रूप ले लेते हैं।

    यातायात और सार्वजनिक जीवन पर असर

    अतिक्रमण का यह दायरा केवल संपत्ति के नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे आम जनता की परेशानियां भी बढ़ गई हैं। भोपाल में बागसेवनिया थाने से अमलतास चौराहे और 11 मील बायपास तक सड़क किनारे बने ढांचों, तंबू-टेंट और आयोजनों के कारण यातायात बुरी तरह प्रभावित होता है। व्यस्त समय में जाम की स्थिति बनती है और कई बार स्थिति संभालने के लिए पुलिस की मदद लेनी पड़ती है। सड़क की चौड़ाई कम होने से वाहनों की गति पर भी असर पड़ रहा है।

    प्रशासनिक उदासीनता और अधिकारियों की भूमिका

    सेवानिवृत्त अधिकारियों और जानकारों का मानना है कि स्थानीय स्तर पर अधिकारी विवाद और विरोध से बचने की कोशिश करते हैं, और शासन स्तर पर व्यापक अभियान न चलने से यह समस्या लगातार विकराल होती जा रही है। राजस्व, नगर निगम, पुलिस और सड़क प्राधिकरण जैसे विभागों के बीच समन्वय की कमी के कारण अवैध निर्माण और उनके व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक नहीं लग पा रही है। जानकारों का कहना है कि जिन मामलों में अधिकारियों की मिलीभगत के आरोप हैं, उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

    विशेषज्ञों की मांग और लैंडबैंक का संरक्षण

    विशेषज्ञों और सेवानिवृत्त अधिकारियों का जोर इस बात पर है कि भविष्य की शहरी विकास योजनाओं, हरियाली और सार्वजनिक सुविधाओं के लिए लैंडबैंक का सुरक्षित रहना बहुत जरूरी है। अनियंत्रित कब्जों के कारण भविष्य में विकास कार्यों के लिए जमीन जुटाना महंगा और कठिन हो जाएगा। मांग की जा रही है कि शासन स्तर पर एक विशेष अभियान चलाकर सरकारी जमीनों की पहचान, सीमांकन और रिकॉर्ड का सत्यापन किया जाए, तथा प्रमाणित अवैध कब्जों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करते हुए उन्हें दोबारा अतिक्रमण से बचाया जाए।

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