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    अदम्य साहस और जज्बे की अद्भुत मिसाल: शारीरिक अक्षमता को मात देकर 15 साल का गर्वित बना एक दिन का कलेक्टर

    डीडवाना | राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिला कलेक्ट्रेट में बुधवार को एक बेहद भावुक और दिल को छू लेने वाला नजारा देखने को मिला। लाडनूं क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गांव रोडू के रहने वाले 15 वर्षीय किशोर गर्वित रेवाड़ का भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी बनने का सपना महज एक दिन के लिए हकीकत में बदल गया। जिला प्रशासन ने एक अनोखी और मानवीय पहल करते हुए गर्वित को प्रतीकात्मक रूप से एक दिन का जिला कलेक्टर नियुक्त किया और कलेक्ट्रेट परिसर में उसका भव्य स्वागत किया। इस भावुक पल ने जहां गंभीर बीमारी से लड़ रहे गर्वित को एक नया आत्मविश्वास दिया, वहीं कलेक्ट्रेट में मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं।

    राजकीय गाड़ी से पहुंचे नए 'कलेक्टर', संभाली कुर्सी और दिए जनहित के निर्देश

    'ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी' (DMD) जैसी लाइलाज और गंभीर जेनेटिक बीमारी से मुकाबला कर रहे गर्वित को पूरे प्रोटोकॉल और राजकीय सम्मान के साथ सरकारी वाहन से जिला मुख्यालय लाया गया। कलेक्ट्रेट आगमन पर जिले के वास्तविक कलेक्टर अवधेश मीणा ने स्वयं गुलदस्ता देकर नए 'कलेक्टर' की अगवानी की। इसके बाद गर्वित को पूरे आदर के साथ जिला कलेक्टर की मुख्य कुर्सी पर बिठाया गया। पदभार ग्रहण करते ही गर्वित ने कलेक्ट्रेट के वरिष्ठ अधिकारियों की एक समीक्षा बैठक बुलाई। बैठक में उन्होंने आम जनता की दिक्कतों को संवेदनशीलता से सुनने और जन-शिकायतों का तय समय सीमा में निपटारा करने के कड़े निर्देश दिए। इस दौरान गर्वित ने प्रतीकात्मक रूप से एक दिन की सरकारी छुट्टी का आदेश भी जारी किया, जिसका कलेक्ट्रेट स्टाफ ने मेज थपथपाकर स्वागत किया।

    गंभीर शारीरिक अक्षमता भी नहीं डिगा सकी हौसला, 10वीं में गाड़े सफलता के झंडे

    गर्वित के जीवन का संघर्ष और उसकी जिजीविषा किसी मिसाल से कम नहीं है। डीएमडी बीमारी के कारण उनके शरीर के अधिकांश हिस्से सुचारू रूप से काम नहीं करते हैं और उन्हें रोजमर्रा के कामों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके बावजूद उनकी मानसिक दृढ़ता इतनी मजबूत है कि उन्होंने हाल ही में घोषित हुए कक्षा 10वीं के नतीजों में 82.83 फीसदी अंक लाकर सबको चौंका दिया था। शारीरिक लाचारी के चलते गर्वित खुद लिखने में असमर्थ थे, इसलिए उन्होंने परीक्षा में एक लेखक (स्क्राइब) की मदद ली और स्वयं बोल-बोलकर अपने उत्तर लिखवाए और यह शानदार कामयाबी हासिल की।

    अभिभावकों की गुजारिश पर प्रशासन ने दिखाई संवेदनशीलता, युवाओं को मिला संदेश

    जिला कलेक्टर अवधेश मीणा ने इस संबंध में बताया कि गर्वित के माता-पिता ने प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात कर बच्चे की इस आखिरी इच्छा और आईएएस बनने के जुनून से अवगत कराया था। इसके बाद प्रशासन ने त्वरित फैसला लेते हुए इस सपने को सच करने की रूपरेखा तैयार की। कलेक्टर मीणा के अनुसार, यह अनूठी कोशिश सिर्फ गर्वित की इच्छा पूरी करने के लिए नहीं थी, बल्कि पूरे समाज को यह संदेश देने के लिए थी कि यदि इरादे फौलादी हों, तो शारीरिक अक्षमता और विपरीत परिस्थितियां भी आपके सपनों का रास्ता नहीं रोक सकतीं। आज गर्वित की यह कहानी देश के हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा का सबब बन चुकी है।

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