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    झालावाड़ हादसे के बाद नया मोड़: 1997 में बने कमरों के लिए प्रशासन ने पंचायत को ठहराया जिम्मेदार

    राजस्थान के झालावाड़ जिले के पिपलोदी गांव के राजकीय प्राथमिक विद्यालय में हुए दर्दनाक हादसे के 24 घंटे में ही जिला प्रशासन ने खुद को पूरी तरह क्लीन चिट दे दी है. शुक्रवार को जारी प्राथमिक जांच रिपोर्ट में अफसरों ने हादसे की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत पर डाल दी. दावा किया गया है कि जो कमरे गिरे, वो 1997 में ग्राम पंचायत द्वारा बनाए गए थे, जबकि शिक्षा विभाग द्वारा बाद में बनाए गए भवन पूरी तरह सुरक्षित हैं.

    जिला प्रशासन की रिपोर्ट में कहा गया कि विद्यालय भवन के दो कमरे ग्राम पंचायत द्वारा 1997 में बनवाए गए थे. इनमें से एक कमरे की दीवार गिरने से एक छात्रा की मौत हो गई, जबकि तीन बच्चे गंभीर रूप से घायल हो गए. प्रशासन का तर्क है कि यह भवन शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड में जर्जर भवनों की सूची में शामिल नहीं था और न ही इसकी कोई मरम्मत हाल के वर्षों में की गई थी.

    शिक्षा विभाग ने झाड़ा पल्ला

    रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि स्कूल के पुराने हिस्से की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की थी. वहीं शिक्षा विभाग के अफसरों ने दावा किया कि विभाग द्वारा बनाए गए नए भवनों की स्थिति बिलकुल सुरक्षित है और वो प्लान और इंजीनियरिंग के अनुरूप बने हैं. इससे इशारा साफ है कि विभाग अपने बनाए हिस्सों की गुणवत्ता पर जोर देकर पुराने निर्माण से पल्ला झाड़ने में जुटा है.

    अधिकारियों ने खुद को बताया बेकसूर

    अधिकारियों की रिपोर्ट और दलीलें जितनी मजबूत दिखती हैं, उतने ही तीखे सवाल भी सामने आ रहे हैं. अगर यह कमरे 1997 में बने थे तो पिछले 27 सालों में किसी भी निरीक्षण में इनकी स्थिति की समीक्षा क्यों नहीं हुई? क्या विभाग ने कभी इन कक्ष को बंद करने या बच्चों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने पर विचार नहीं किया? क्या पंचायत ने कभी रिपोर्ट भेजी कि कमरे जर्जर हो रहे हैं?

    गांव के लोगों का कहना है कि हादसे से पहले भी स्कूल की बिल्डिंग की स्थिति कई बार प्रशासन को बताई गई थी, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. अगर दीवार गिरने से पहले कार्रवाई हो जाती तो बच्ची की जान बचाई जा सकती थी. अब सब अपनी जिम्मेदारी से बचने में लगे हैं.

    राजनीतिक दलों का भी तंज

    विपक्षी नेताओं ने इस रिपोर्ट को “रूटीन क्लीन चिट प्रक्रिया” बताया है. पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कहा कि अगर शिक्षा विभाग पहले कार्रवाई करता, तो यह हादसा नहीं होता. प्रशासन केवल जांच रिपोर्टों में नहीं, जमीनी स्तर पर जवाबदेह हो तभी ऐसी घटनाएं रुकेंगी.

    प्रशासन ने पूरे स्कूल की दोबारा जांच कराने का निर्देश दिया है और तकनीकी रिपोर्ट के आधार पर मरम्मत या पुनर्निर्माण की बात कही है. मगर बड़ा सवाल यही है कि क्या हर हादसे के बाद रिपोर्ट और जिम्मेदारी ट्रांसफर से ही काम चलाया जाएगा, या अब कोई ठोस कार्रवाई होगी?

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