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    माघ मेले में कल्पवास के बाद लगतारा हो रहा शैय्या दान, आखिर क्यों कहा जाता है इसे पश्चाताप का दान

    माघ मेला में कल्पवास का विशेष महत्व है. कल्पवास में संगम तट पर एक माह तक साधक सात्विक जीवन, गंगा स्नान, दान और भजन-कीर्तन करते हैं. मान्यता है कि कल्पवास करने से 100 वर्षों की तपस्या के बराबर पुण्य फल प्राप्त करता है. आइए जानते हैं माघ मेला में कल्पवास का महत्व…

    माघ मेले में कल्पवास का विशेष महत्व होता है. भक्त सभी तरह के पापों से मुक्ति पाने और किसी गलती के पश्चाताप के लिए कल्पवास करते हैं. माना जाता है कि कल्पवास के साथ शैय्या दान (सेझिया दान) करना भी जरूरी है. अब संगम के तट पर माघ महीने में भक्त कल्पवास के बाद शैय्या दान कर रहे हैं, जिसमें घर की हर जरूरत में इस्तेमाल होने वाली बड़ी से बड़ी वस्तु दान की जाती है. कल्पवास का यह दान हजारों वर्षों से चलन में है. यह दान इसलिए किया जाता है ताकि व्यक्ति जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाए और परलोक में सुख मिले. आइए जानते हैं आखिर कल्पवास के बाद किए जाने वाला शैय्या दान को क्या कहा जाता है पश्चाताप का दान…

     कल्पवास और शैय्या दान पर दंडी स्वामी महेशाश्रम महाराज ने बताया कि माघ मेले में भक्त कल्पवास करने आते हैं और जो भक्त 12 साल का कल्पवास करता है, उसे 12 साल पूरे होने के बाद शैय्या दान करना चाहिए. शैय्या दान को ग्रंथों में पश्चाताप का दान कहा गया है, जिसका उद्देश्य है पापों का नाश करना और पुरानी गलतियों की माफी है. अगर 12 साल का कल्पवास कर लिया जाए तो जन्म और मृत्यु के फेर से मुक्ति मिल जाती है और जातक मोक्ष को प्राप्त हो जाता है.

     तीर्थ पुरोहित प्रयागराज विनय मिश्रा ने कहा कि कल्पवास तभी पूरा माना जाता है जब शैय्या दान किया जाता है. यह पापों से मुक्ति दिलाने का मार्ग है और हर साल भक्त माघ मेले में प्रयागराज आकर दान करते हैं. ये दान हर ब्राह्मण को लेने का अधिकार नहीं होता है. इसे कुल के पुरोहित ही ले सकते हैं, क्योंकि यह दान भी पापों का दान है. शैय्या दान में वो चीजें दी जाती हैं, जो सामान्य जन अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल करते हैं. पहले लोग 3, 5 और 12 साल का कल्पवास करते थे, लेकिन अब स्वास्थ्य को देखते हुए एक ही साल का करते हैं.

     बता दें कि कल्पवास में किया गया शैय्या दान बहुत महत्वपूर्ण दान होता है, जिसे पौष माह के 11वें दिन से प्रारंभ होकर माघ माह के 12वें दिन तक किया जा सकता है. कल्पवास में भक्त संगम के तट पर देवताओं का पूजन और ध्यान करते हैं और फिर दान देखकर कल्पवास की प्रक्रिया को पूरा किया जाता है. शास्त्रों में कल्पवास की न्यूनतम अवधि एक दिन, तीन दिन, तीन महीने, छह महीने, 2 साल, 3 साल और 12 साल की भी होती है.

     शैय्या दान दो तरह से किए जाते हैं. जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तब श्राद्ध कर्म के दौरान किए जाने वाला दान शैय्या दान केवल महापात्र लेते हैं. इस दान को तीर्थ पुरोहित स्वीकार नहीं करते हैं. वहीं जो लोग कल्पवास की अवधि पूरा करने के बाद शैय्या दान करते हैं, उसको तीर्थ के पुरोहित स्वीकार कर लेते हैं.

     

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