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    निवेश में कमी और आर्थिक सुस्ती का असर: भारतीय बैंकों के लिए बढ़ा संकट, मुनाफे में लगातार गिरावट

    मार्च 2025 की तिमाही बैंकों के लिए कोई खास अच्छी नहीं रही. इस बार बैंकों का कुल मुनाफा सिर्फ एक अंक में बढ़ा, जो पिछले चार साल यानी 17 तिमाहियों में पहली बार देखने को मिला. प्राइवेट सेक्टर के बैंकों की कमजोर परफॉर्मेंस और देश के सबसे बड़े बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के मुनाफे में कमी ने इस सुस्ती की बड़ी वजह बनकर सामने आई. नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) में भी सिर्फ एक अंक की बढ़त दर्ज हुई, जबकि मार्जिन पर लगातार दबाव बना रहा. हालांकि, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने सितंबर से बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त लिक्विडिटी डालने की शुरुआत की और ब्याज दरों में कटौती की, जिससे आने वाले समय में बैंकों की स्थिति सुधरने की उम्मीद जताई जा रही है.

    SBI के मुनाफे में भी भारी गिरावट

    29 बैंकों के एक सैंपल पर नजर डालें तो कुल नेट प्रॉफिट में 4.9% की बढ़त देखी गई, जो 93,828.3 करोड़ रुपये रही. लेकिन देश का सबसे बड़ा बैंक SBI इस बार मुनाफे के मामले में पिछड़ गया. SBI का नेट प्रॉफिट 9.9% गिरकर 18,642.6 करोड़ रुपये पर आ गया. इस सैंपल में SBI की हिस्सेदारी 20% थी, जो इस बात को दर्शाता है कि SBI का प्रदर्शन कुल आंकड़ों पर कितना असर डालता है. पब्लिक सेक्टर बैंकों ने मिलकर 13% की प्रॉफिट ग्रोथ हासिल की, जो 48,403.4 करोड़ रुपये रही. लेकिन ये बढ़त पिछले 11 तिमाहियों में सबसे कम थी. इससे पहले जून 2022 की तिमाही में 9.2% की ग्रोथ दर्ज की गई थी.

    पब्लिक सेक्टर बैंकों का प्रदर्शन भले ही सुस्त रहा हो लेकिन प्राइवेट बैंकों की हालत और खराब रही. प्राइवेट सेक्टर बैंकों का कुल मुनाफा 2.5% गिरकर 45,424.9 करोड़ रुपये पर आ गया. ये पिछले 13 तिमाहियों में पहली बार हुआ जब प्राइवेट बैंकों के मुनाफे में सालाना आधार पर गिरावट देखी गई. इस कमजोर प्रदर्शन ने प्राइवेट बैंकों की हिस्सेदारी को भी प्रभावित किया. सैंपल के कुल मुनाफे में उनकी हिस्सेदारी 52.1% से घटकर 48.4% रह गई, जो पिछले आठ तिमाहियों में सबसे कम थी.

    नेट इंटरेस्ट इनकम में 14 तिमाहियों की सबसे कम बढ़त

    बैंकों की नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) में भी सुस्ती देखने को मिली. इस तिमाही में NII सिर्फ 3.7% बढ़कर 2.1 लाख करोड़ रुपये रही, जो पिछले 14 तिमाहियों में सबसे कम ग्रोथ थी. पब्लिक सेक्टर बैंकों की NII में महज 2.4% की बढ़त दर्ज हुई, जबकि प्राइवेट सेक्टर बैंकों ने 5.3% की बढ़त दिखाई. ये आंकड़े बैंकों की मुश्किलों को साफ तौर पर बयां करते हैं.

    नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर कई तिमाहियों से दबाव बना हुआ है. इसका सबसे बड़ा कारण है कि रेपो रेट में कमी के बावजूद बैंकों ने डिपॉजिट रेट्स को कम करने में देरी की. मार्च 2025 की तिमाही में सैंपल के 29 में से 19 बैंकों ने अपने NIM में सालाना आधार पर गिरावट दर्ज की. ये स्थिति बैंकों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है, क्योंकि मार्जिन का कम होना सीधे तौर पर उनके मुनाफे को प्रभावित करता है.

    RBI के सहयोग से पटरी पर लौट सकती है बैंकों की मुनाफे की रफ्तार

    हालांकि, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इस स्थिति से निपटने के लिए कुछ कदम उठाए हैं. सितंबर 2024 से RBI ने बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त लिक्विडिटी डालने की शुरुआत की. इसके अलावा, ब्याज दरों में कटौती भी की गई, जिससे बैंकों पर मार्जिन का दबाव कम होने की उम्मीद है. विशेषज्ञों का मानना है कि इन कदमों का असर अगली कुछ तिमाहियों में दिख सकता है, और बैंकों की मुनाफे की रफ्तार फिर से पटरी पर लौट सकती है.

    क्या है नेट इंटरेस्ट मार्जिन और क्यों है ये इतना अहम?

    नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) किसी बैंक की कमाई का एक अहम हिस्सा होता है. ये वो अंतर है जो बैंकों को लोन पर मिलने वाले ब्याज और डिपॉजिट पर दिए जाने वाले ब्याज के बीच मिलता है. जब रेपो रेट में कटौती होती है, तो बैंकों को अपने लोन की ब्याज दरें कम करनी पड़ती हैं, लेकिन डिपॉजिट रेट्स को कम करने में समय लगता है. यही वजह है कि NIM पर दबाव बढ़ता है और बैंकों का मुनाफा प्रभावित होता है.

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