मुंबई। महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्थित प्रसिद्ध गोकुल दूध संघ के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के चुनाव से ठीक पहले देवेंद्र फडणवीस सरकार के एक नए फैसले ने राज्य की राजनीति में बड़ा भूचाल ला दिया है। सरकार ने 500 करोड़ रुपये से अधिक सालाना टर्नओवर वाली सहकारी संस्थाओं में पांच सरकारी नामित निदेशकों की नियुक्ति को मंजूरी दे दी है, जिसे लेकर कांग्रेस ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का ऐलान किया है।
क्या है गोकुल दूध संघ विवाद की पूरी पृष्ठभूमि?
हाल ही में संपन्न हुए गोकुल दूध संघ के चुनाव में कांग्रेस समर्थित सतेज पाटिल के पैनल ने 25 में से 13 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि भाजपा समर्थित महायुति गठबंधन के खाते में 12 सीटें आई थीं। इस प्रकार 13-12 के करीबी समीकरण के साथ कांग्रेस समर्थित पैनल बहुमत में था। लेकिन राज्य सरकार के इस नए संशोधन के बाद संचालक मंडल का पूरा चुनावी गणित और अध्यक्ष पद का मुकाबला बेहद रोमांचक व विवादित हो गया है।
सरकार के नए फैसले के मुख्य बिंदु
नए नियमों के तहत 500 करोड़ से अधिक कारोबार वाली सहकारी समितियों के बोर्ड में पांच सदस्यों को नामित किया जाएगा। इसमें एक सरकारी अधिकारी (सहायक रजिस्ट्रार या उससे ऊपर) और चार ऐसे विशेषज्ञ व्यक्ति शामिल होंगे जिन्हें संस्था के कामकाज का अनुभव हो। हालांकि सरकारी अधिकारी को वोटिंग का अधिकार नहीं होगा, लेकिन बाकी चार नामित सदस्यों को संचालक मंडल में मतदान का हक दिया गया है। हालांकि ये चारों सदस्य अध्यक्ष पद के चुनाव में खुद उम्मीदवार नहीं बन सकेंगे, लेकिन इनका वोट किसी के भी पाले में खेल बदल सकता है।
कांग्रेस का तीखा हमला और सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी
कांग्रेस पार्टी ने इस फैसले को लोकतांत्रिक जनादेश पर सीधा हमला बताया है। कांग्रेस सांसद और प्रवक्ता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि चुनाव संपन्न होने के बाद नियमों में बदलाव करना सरासर गलत है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब परिणाम आ चुके हैं, तो क्या सरकार सिर्फ सत्ता के जोर पर चुनावी गणित बदलना चाहती है। कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वे सहकारी संस्थाओं की स्वायत्तता बचाने के लिए इस मामले को लेकर सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे।
10 नवंबर को होना है चुनाव
बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेशानुसार गोकुल दूध संघ के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद का चुनाव 10 नवंबर को होना है। नियमों के मुताबिक चुनाव के लिए 14 सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य है। ऐसे में सरकार द्वारा लाए गए नए नामित सदस्यों की नियुक्ति और उनके मतदान के अधिकारों को लेकर कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर घमासान अपने चरम पर पहुंच गया है।



